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ठंडी -ठंडी छाँव  "माँ" फरिश्तों के जहां से , वातसल्य कि सुनहरी चुनरियाँ ओढे , सुन्दर, सजीली ,मीठी ,रसीली , दिव्य आलौकिक प्रेम से प्रका शित ममता की देवी  'माँ ' परस्पर प्रेम ज्ञान के दीपक जला ती रहती।  ममत्व की सुगन्ध कि निर्मल प्रवाह धारा   प्रेम के सुन्दर रंगो से दुनियाँ सजाती रहती  समर्पित पूर्ण रूपेण समर्पित '
  ममता की ठंडी -ठंडी छाँव देने को , पवित्र गंगा की  धारा बन ,अवगुण सारे बहा ले जाती।  निरंतर बहती रहती ,बच्चों कि जिंदग़ी सवांरने मे स्वयँ को भूल  जीवन बिता देती ,            दर्द मे दवा ,बन  मुसकराती  रहती।  बिन कहे दिल कि कर जाती  जाने उसे कहाँ से आवाज़ आती , सभी बड़े -बड़े पदों पर बैठे जनों कि जननीं है, जननीं कि कुर्बानी।  पर उसके दिल कि किसी ने नहीं जानी , वही  है ,दुर्गा , वही है लक्ष्मी ,सरस्वतीं ,काली   दुनियाँ  सारी उसी से , यही तो है ,  दिव्य ,अलौकिक  जननीं कि निशानी  बड़ी विचित्र ,है'' माँ ''  के दिल कि कहानी।
''   परियों वाली ऑन्टी '' उस नन्हें बच्चे कि रोने कि आवाज़ें मानो कानोँ को चीर रही  थीं। दिल में एक गहरी चोट कर रही थी। बहुत सोचा दिल नहीं माना .  मैंने आख़िर दरवाजा खोलकर देख ही  लिया। देखा तो दिल पहले से भी  अधिक दुः खी हो गया ,पांच साल कि नन्ही बच्ची दो साल के अपने छोटे भाई को लिये घर के बाहर बैठे थी और  अपने भाई  को सँभाल रही  थीं।  कई तरह के यत्न कर रही थी कि उसका भाई किसी तरह रोंना  बन्द कर दे। पर शायद वो भूखा था।  वो बहिन जो सवयं की देख -रेख भी ढंग से नही  कर सकती थी  वह  बहिन अपने भाई  को बड़े  यत्न से सँभाल रही थीं बहिन का फर्ज निभा रही थी। बहुत पीड़ा हो रही थी उन बच्चों को देखकर ,शायद पेट कि क्षुधा को शान्त करने के लिये वह लड़की अपने भाई  को लेकर कभी किसी के घर के आगे बैठती कभी किसी के -----शायद कहीं से कुछ को खाने को मिल जाएं आखिर मेरे मन कि ममता ने मुझे धिक्करा मै जल्दि  से उन बच्चोँ के खा ने के लिये कुछ ले आई , लड़की ने तो झट से रोटी और सब्जी खा ली ,  परंतू भाई अभी भी  रो रहा था ,वह छोटा था ,मैने उसके भाई के लिये कुछ बिस्कीट खाने को दिये फ़िर जाकर वह बच्चा शान…
जिस  दिल में मोहब्ब्बत होती है  2हंसना  ,मुस्कराना , इतराना , इठलाना ,
 यही तो  मोहब्बत  करने  वालों की पहचान  है ,      मोहब्बत  में इंसान  सबसे अमीर हो। जाता है। जेब  में ख़ाक। नहीं , दिल। में मोहब्बत। की नियामतें    मोहब्बत में  इंसान  के पर  निकल  आते हैं ,
    हौंसलों  की  उड़ान  लम्बी  और पकड़  मजबूत  हो जाती है    अपनी धुन में  मस्त  आवारा पंछी  ,         दिल  में चुभन  चेहरे पर  मुस्कान ,           बड़ा  देती  है,  चेहरे  की रौनके  ,
दिल को  किसी से बैर  नहीं , लाख  करे कोई  फरेब सही या  यूं  कहिये ,  मोहब्बत अपना स्वभाव नहीं  छोड़ती।
दिल  की  खूबसूरत अदायें सब कुछ सवाँर देती  हैं ,
खुशमिजाजी   मोहब्बत  करने वालों का स्वभाव बन बन जाता है ।
''हिंदी  मेरी मातृभाषा माँ तुल्य पूजनीय ''          जिस भाषा को बोलकर  मैंने अपने भावों को व्यक्त किया ,जिस भाषा को बोलकर मुझे मेरी पहचान मिली ,मुझे हिंदुस्तानी होने का गौरव प्राप्त हुआ उस माँ तुल्य हिंदी भाषा को मेरा शत -शत नमन।  भाषा विहीन मनुष्य अधूरा है। भाषा ही वह साधन है जिसने सम्पूर्ण विशव के जनसम्पर्क को जोड़ रखा है।  जब शिशु इस धरती पर जन्म लेता है ,तो उसे एक ही  भाषा आती है वह है,  भावों की भाषा ,परन्तु भावों की भाषा का क्षेत्र सिमित है। मेरी मातृभाषा हिंदी सब भाषाओँ में श्रेष्ठ है।  संस्कृत से जन्मी देवनागरी लिपि में वर्णित हिंदी सब भाषाओँ में श्रेष्ट है।  अपनी मातृभाषा का प्रयोग  करते समय मुझे अपने  भारतीय होने का गर्व होता है।  मातृभाषा बोलते हुए मुझे अपने देश के प्रति मातृत्व के भाव प्रकट होते हैं।   मेरी मातृभाषा हिंदी मुझे मेरे देश की मिट्टी  की  सोंधी -सोंधी महक देती रहती हैं  ,और भारतमाता    माँ  सी  ममता।     आज का मानव स्वयं को  आधुनिक कहलाने की होड़ में  'टाट में पैबंद ' की तरह अंग्रेजी के साधारण  शब्दों का प्रयोग कर स्वयं को  आधुनिक समझता  ह…
बुलंदी की ऊँचाइयाँ   बुलन्दी की ऊँचाइयाँ कभी भी अकेले आसमान नहीं छू पाती ,परस्पर प्रेम ,मैत्री ,सद्भावना  विश्व्कुटुम्ब्क की भावना  ही तरक्की की  सीढ़ियां हैं।
धार्मिक संगठन किसी भी देश -प्रदेश की भगौलिक प्राकृतिक परिस्थियों के अनुरूप नियमों का पालन करते हुए अनुशासन में रहते हुए संगठन में रहने के गुण भी सिखाता है।
अपनी विषेश पहचान बनाने के लिये या यूं कहिए की अपने रीती -रिवाज़ों को अपनी परम्पराओं व् संस्कृति को जीवित रखने के लिए किसी भी धर्म जाती या  संगठन या समूह का निर्माण प्रारम्भ हुआ होगा इसमें कोई दो राय नहीं हैँ,ना ही यह अनुचित है। परन्तु कोई भी धर्म या परम्परा जब जड़ हो जाती है ,भले बुरे के ज्ञान के अभाव में आँखों में पट्टी बाँध सिर्फ उन परम्पराओं का निर्वाह किया जाता है ,तो वह निरर्थक हो जाती है। समय।,काल ,वातावरण के अनुरूप परम्पराओं में परिवर्तन होते रहना चाहिए परिवर्तन जो प्रगर्ति का सूचक हो। शायद ही कोई धर्म किसी का अहित करने को कहता हो , कोई भी इंसान जब जन्म लेता है ,एक सा जन्मता है सबकी रक्तवाहिनियों में बहने वाले रक्त का रंग भी एक ही होता है' लाल '. हाँ किसी भी क्ष…
मोहब्बत -  अनकहें शब्दों की भाषा है !!!!!! मोहब्बत सुरों की सुमधुर झंकार है,  इसी से रचा सुन्दर संसार है , अनकहें शब्दों की मीठी परिभाषा है ,  मोहब्बत नज़रों  की भाषा है।  
 पवित्र रिश्ता  दिल में तूफ़ान , चेहरे पर मुस्कान  जहर पी कर भी मुस्कराना ही तो  मोहब्बत करने वालो का हुनर है।  मोहब्बत आती नहीं सभी को रास ,  सिर्फ पा लेना ही नहीं   सबकुछ ख़ाक हो जाना भी   मोहब्बत को करता अमर है। 
पुष्पों में सुगन्ध  की तरह,  समीर में लीन हो जाना , दिए में बाती संग,  तेल का स्वाहा  हो जाना ही तो है  मोहब्बत।  
दिलो से खेलने का शौंक न पालो मेरे युवा साथियों , मोहब्बत के सुकून में तूफानों का अनदेखा पैगाम भी है,  तूफानों की चोटों का नासूर बन जाना भी आम है,  यह एक गहरा समुन्दर  है , समुन्दर  में रत्नों  का भंडार है,  समुन्दर में सैलाब का आना  भी संभव है।  फिर भी पंछियों की तरह ऊंची उड़ान भर- भर  कर ऊँचे-ऊँचें   सपने देखना  हँसना , मुस्कराना ,इतराना, इठलाना, यही  तो मोहब्बत करने  वालों की पहचान है।
फिल्मी दुनिया   फिल्म बनाते समय फिल्मकार का  मुख्य उद्द्शेय अधिक से अधिक पैसा कमाना होता है।  फिल्मकार नए -नए अनुभव आजमाते हैं ,जो दर्शकों को पसंद आए और उनके दिलों दिमाग पर छा जाएं।  कुछ काल्पनिक कुछ सत्य घटनाओं पर आधारित कथानक के माधय्म से फिल्म में संगीत, डायलॉग  आकर्षक दृश्यों का मिर्च मसाला मिलकर फिल्म तैयार की जाती है। फिल्म के अभिनेता अभनेत्री अगर अपने अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन करने में सफल हो जाते हैं , तो फिल्म तो दौड़ पड़ती है।  किसी भी फिल्म में नयापन  परोसना महत्वपूर्ण पासा होता है।, क्योंकि  वही  नयापन फिल्म  को आगे  बढ़ाने वाली  सीढ़ी  का काम करता है,ओर जहां तक सवाल है की किसी फिल्म की कहानी समाज में जागरूकता लाने का काम करती है  तो , इसका  श्रेय   फिल्म के  कथानक  को ही  जाता  है। 
कोई भी  फिल्मकार शायद ही समाज को  जाकरूक करने के लिए फिल्म बनाता  है। निर्देशक का मुख्य उद्द्शेय तो अधिक से अधिक पैसा वसूल करना होता है।  किसी भी फिल्म की सफलता का श्रेय  कहानी लिखने वाले  दृश्यांकर्ता  संगीतकार  व् उस फिल्म में काम करने वाले  कलाकारों को ही जाता है ,उस समय कोई भी दर्शक यह नही…