संदेश

जूनून
जो दिल से निकलती  ,है वही सच्ची कविता होती है , दिल में जो आग है ,तूफ़ान है  कुछ कर गुजरने का जनून है ,ऐसे लोगो को  कहाँ  सुकून है। 
दिल की हलचल ही तो वरदान है।  मनुष्य तो यूँ ही बदनाम है।  नेकी की राह चलना नहीं बहुत आसान है।  नेकी की राह पर चलने वाले मा ना  की बहुत कम हैँ। 
पर नेकी की राह पर चलने वालों की जिद्द के आगे आसमां भी बुलंद है।  यही तो जीवन का द्वन्द है , लोग क्या कहेंगे की छोड़ो  , दिल में जो  आग है , उसे करके छोड़ो।   माना की राहें बहुत तंग हैं , रोशनी के घरौंदे  तले  अँधेरा  बहुत है 
जिनके जीवन में उम्मीदों का संग है,  उन्हें मुश्किलों से लड़ जाना पसंद है। उम्मीदें ही तो भरती जीवन में नया रंग हैं। जीवन के केनवास  में सुन्दर  रंग भरना  भी एक कला है , नेकी की राह पर चलकर मंजिल पा जाने  वाले को मिलता परमानन्द है।
सत्संग औषधि       यूँ तो हमारे शहर में कई कथाओं का आयोजन होता रहता है ,कुछ समय पूर्व हमारे घर से कुछ ही दूरी पर भागवत कथा का आयोजन हुआ ,कोई बहुत बड़े संत आ रहे थे , हम एक दो पड़ोसियों ने मिलकर प्रोग्राम बनाया की हम रोज भागवत   सुनने जाएंगे ,हम चार महिलाओं की सहमति हो गयी ,आखिर कथा का दिन आ गया ,हम चारों महिलाएं घर का सारा काम निपटा के अच्छे से तैयार होकर घर से चल दी। हमारी चेहरों की चमक ही अलग थी ,चेहरों के हाव -भाव दिल की ख़ुशी ब्यान कर रहे थे। तभी राह चलते -चलते एक महिला मिल गयी ,बोली क्या बात है इतने अच्छे से तैयार होकर कहाँ जा रही हो, शॉपिंग पर जा रही हो क्या /....  कोई सेल लगी है क्या। …?  इस पर हम चारों महिलाएं मुस्करा दी और बोली हाँ लगी है ,चलो तुम भी चलो ,वह बोली नहीं आज नहीं कल चलूंगी यह सैल कितने दिन चलेगी ,मैंने बोला आठ दिन और हम सब तो आतों दिन जाएंगी ,इस पर वह महिला बोली आठों दिन ज्यादा पैसा आ रहा  क्या। …? कितनी शॉपिंग करोगी ?   इस पर मै बोली इस सेल मै पैसा नहीं लगता ,  वह महिला फिर चकित ----- ऐसे कौन सी सेल है ,जहां पैसा नहीं लगता मै भी चलूँगी।        अगले दिन वह महिला भी तैयार …
'' खुला दरवाजा ''           

आज मैं कई महीनों  बाद अपने दूर के रिश्ते की अम्मा जी  से मिलने गयी।  ना जाने क्यों दिल कह रहा था ,की
ऋतु कभी अपने बड़े -बुजर्गों से भी मिल आया कर। आज कितनी अकेली हैं वो अम्मा ,  कभी वही घर था ,
भरा पूरा , अपने चार बच्चे ,  देवर -देवरानी उनके  बच्चे ,  सारे दिन चहल -पहल  रहती थी ,  ये नहीं की  मन मुटाव नहीं होते  थे , फिर भी दिलों मे मैल नहीं था।  दिल लगा  रहता था  मस्त।
मुझे याद है , जब  उनके बडे बेटे की शादी  हुई थी , बहुत खुश थी  अम्मा  की बहू आएगी  ,चारों तरफ  खुशियाँ होगी ,पोते -पोतियों  को खिलाऊँगी  ,कुछ महीने तो सब ख़ुशी -ख़ुशी  चलता रहा , परन्तु अचानक एक दिन
बेटे की नौकरी का तबादला हो गया , वह तबादला ट लने वाला नहीं था ,बस क्या था बहू बे टा दूसरे शहर बस गए।
एक एक करके चारों बेटों की शादियाँ  हो गयी।   सब कुछ ठीक से चलता रहा ,परन्तु  आज वो सयुंक्त  परिवार में रहने वाली अम्मा  जिसके सवयं के चार बेटे -बहुएँ  पोते -पोतियाँ  हैं ,सब अपने अलग -अलग मकानों में अलग जिंदगियाँ बिता रहें हैं।  
बूढ़ी अम्मा के घर का दरवाजा यूँ ही बंद रहता …
' हर -हर गंगे ' मै हूँ ,भारत की पहचान , भारतवासियों का अभिमान ,मा गंगा कहकर करतें हैं  सब मेरा सम्मान , सबके पाप पुण्य मुझे ही अर्पण ,मै हूँ निर्मलता का दर्पण , हिमालय की गोद से निकली ,गंगोत्री है मेरा धाम , शिव की जटाओं से नियन्त्रित ,प्रचण्ड वेग ,पवित्रतम गंग धारा।  सूर्य के तेज से ओजस्वी ,चन्द्रमा की शीतलता लिए ,चांदी सी , चमकती ,पतित पावनी पापों को धोती ,गतिशीलता  ही मेरी पहचान   भक्तों की हूँ ,मई आन बान और शान , गंगा जल से पूर्ण होते हैं सब काम , भगीरथी सुरसरि गंगे मैया इत्यादि हैं मेरे कई नाम ,   भक्त गंगे मैया गंगे मैया ,कहकर करते हैं जीवन नैया पार  युगों युगों से करती आई, भक्तों के जीवन का उद्धार  अपने भक्तों के पाप पुण्य सब मुझे हैं स्वीकार।
''  मेहनती हाथ  '' मेहनत मेरी पहचान ,मैं  मजदूर मजे से दूर।  धनाभाव के कारण  थोड़ा मजबूर , मैले कुचैले वस्त्र मिट्टी से सने हाथ।  तन पर हज़ारों घात कंकाल सा  तन 
मै मज़दूर कभी थकता नही , क्या कहूँ थक के चूर -चूर  भी हो जाऊं पर कहता नहीं। 
क्योंकि में हूँ मजबूर  मज़दूर------ मेरे पसीने की बूँदों से सिंचित बड़ी -बड़ी आलीशान ईमारतें  देख -देख सवयं पर नाज़ करता हुँ।  और अपनी टूटी -फूटी झोपड़ियों मे खुश रहता हूँ। 
यूं तो रहते हैं सब हमसे दूर , पर बड़े -बड़े सेठ हम से काम करवाने को मज़बूर  मजदूरों के बिना रह जाते हैं बड़े -बड़े आलिशान इमारतों के सपने अधूरे ----- में मजदूर सबके बड़े काम का ,फिर भी त्रिस्कृत  नहीं मिलता अधिकार मुझे मेरे हक का , में मजदूर बड़े काम का । 

''   दर्पण ''
         शायद मेरा दर्पण मैला है ,यह समझ , मै उसको बार -बार साफ़ करता।  दाग दर्पण में नहीं , मुझमे है, मुझे यकीन नहीं था।  परन्तु एक मसीहा जो हमेशा मेरे साथ चलता है , मुझे अच्छे बुरे का विवेक कराता है ,मेरा मार्गदर्शक है , मुझे गुमराह होने से बचाता है।  पर मै मनुष्य अपनी नादानियों से भटक जाता हूँ , स्वयं को समझदार समझ ठोकरें पर ठोकरें खाता  हूँ।  दुनियाँ की रंगीनियों में स्वयं को इस क़दर रंग लेता हूँ , कि अभद्र हो जाता हूँ ,  फिर दर्पण देख पछताता हूँ।  रोता हूँ ,और फिर लौटकर मसीहा के पास जाता हूँ ' उस मसीहा परम पिता के आगे शीश झुकता हूँ , उस पर भी अपनी नादानियों के इल्जाम मसीहा पर लगता हूँ।  वह मसीहा हम सब को माफ़ करता है , वह मसीहा हम सब की आत्मा में बैठा परम पिता परमात्मा है।
देने के सिवा मुझे  कुछ आता नहीं !!!!!                                                               एक दिन मैंने पुष्प से पुछा                                                          आकाश की छत  मिटटी की गोद ,                                                        क्या कारण  है जो काटों के  बीच भी,                                                              बगीचो की शोभा बढ़ाते  हो ,                                                    दुनिया को रंग-बिरंगा खूब सूरत बनाते हो                                                                   मुस्कुराहटें  फैलाते हो।
                                                           उदास चेहरों पर हँसी  ले आते हो                                                            इत्र बनकर हवा में समा  जाते हो                                              अपने इस छोटे से जीवन में जीने का अर्थ बता जाते हो                                                                ख़ुशी का सबब बन जाते हो।
                                                          पुष्प ने …