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भक्ति क्या है ??? भक्ति एक सुंदर  भाव  है। भक्ति दिखावे की चीज नहीं  ,बंधन नहीं  मुक्ति का नाम है,भक्ति।  घंटो  किसी पूजा स्थल पर या फिर मंदिर ,गुरुद्वारे आदि पवित्र स्थलों में बैठकर पूजा करना भी भक्ति ही है। परन्तु भक्ति घंटों किसी स्थल पर बैठ कर ही संभव है यह सत्य नहीं पर यह चिर -स्थाई भक्ति की और ले जाने वाली सीढियाँ हैं।  भक्ति वह भावना है ,जहाँ भक्त का मन या फिर यूं कहिये की भक्त की आत्मा परमात्मा  में स्थिर हो जाती है। भक्त को घंटों किसी धार्मिक पूजा- स्थलपर बैठकर प्रपंच नहीं रचने पड़ते ,वह कंही भी बैठ कर प्रभु को याद कर लेता है।उसका चित परमात्मा में एकसार हो जाता है।  भक्त अपने इष्ट के प्रति निष्काम प्रेम और समर्पण का नाम है। भक्ति श्रधा है। भक्ति बंधन नहीं। मुक्ति है ,भक्ति में भक्त अपने परमात्मा या इष्ट से आत्मा से जुड़ जाता है ज्यों माँ से उसका पुत्र। भक्ति में भक्त को कुछ मांगना नहीं पड़ता। उसका निस्वार्थ प्रेम उसे स्वयमेव भरता है। ज्यों एक माँ अपने पुत्र की इच्छा पूरी करती है। देना एक माँ और पमात्मा का स्वभाव है।  भक्ति निष्काम प्रेम की सुंदर अवस्था है।
हिंदी मेरी मात्रभाषा है माँ तुल्य पूजनीय है 



मेरी मात्रभाषा हिंदी है । मै गर्व से कहती हूँ! जिस भाषा को बोलकर सर्व- प्रथम मैंने अपने भावों को प्रकट किया ,जिसे बोलकर बन जाते हैं मेरे सरे काम ,उस भाषा का मै दिल से करती हूँ  सम्मान। आज विशेषकर भारतीय लोग अपने देश की भाषा अपनी मात्रभाषा को बोलने में स्वयं को छोटा महसूस करते हैं। अंग्रेजी भाषा को प्राथमिकता देकर स्वयं को विद्वान् समझते हैं। मात्रभाषा बोलने में हीनता महसूस करते हैं। हिंदी में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करके समझते हैं की आधुनिक हो गए हैं। क्या  आधुनिकता की पहचान अंग्रेजी भाषा ही है ? अरे! नहीं- नहीं आधुनिकता किसी भाषा पर निर्भर नहीं हो सकती। आधुनिकता किसी भी समाज द्वारा किये गए ,प्रगति के कार्यों से उच्च संस्कृति व् संस्कारों से होती है।जापान के लोग अपनी मात्रभाषा को ही प्राथमिकता देते हैं,क्या वह देश प्रगति नहीं कर रहा ,बल्कि प्रगति की राह में अपना लोहा मनवा रहा है ।
अरे नहीं कर सका जो अपनी माँ सामान मात्रभाषा का सम्मान ,उसका स्वयं का सम्मान भी अधूरा है , खोखला है, अपनी जड़ों से हिलकर हवा में इतराना चाह रहा है । संसार…
            " रोना बन्द करो  
                                                         अपना भाग्य स्वयं लिखे
 सामन्यता मनुष्य भाग्य को कोसते रहते हैं ,कि मेरा भाग्य अच्छा नहीं ,स्वयं को छोटा समझना कायरता है। 
स्वयं को बड़ा बनाना है तो ,अपने भाग्य का रोना बंद करना होगा। कोई भी मनुष्य छोटा या बड़ा नहीं जन्मता एक सा जन्मता है 'एक सा मरता है। कोई भी मनुष्य कर्म से ही महान होता है। जितनी भी महान हस्तियाँ हुई हैं। वे अपने कर्मो के कारण ही महान हुई हैं। जैसे गांधीजी ,मदर टेरेसा ,स्वामी विवाकानंद ;आ दि।
 गाँधी जी ,के विचार थे ,'सादा जीवन उच्च विचार। मदर टेरेसा अपने पास रखती थी एक थाली एक  लौटा ।ऐसी कई महान हस्तियाँ हुई जो अपने निस्वार्थ कर्मो के कारण महान हुई ,उनके पास थी आत्म -बल की शक्ति। 
अतः रोना बंद करो जीवन को उन्नत बनाने के लिए समर्पित कर्म करो ,जिसमे कर्तापन का अहंकार न हो। ऐसा कर्म करे जिसमे सेवा व् धर्म हो। कुछ हमारी मानसिकता कुछ हमारे आस पास का वातावरण हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। जैसे परिवेश हम रहते हैं ,स्वयं को वैसा ही समझने लगते हैं। राजा का बेटा स्वयं को…
आदतों के गुलाम मत  बनो
  मनुष्य आदतों का गुलाम बनारहता है।  आदतें क्या हैं ,जिन्हें हम कई बार छोड़ना तो चाहतें हैं ,परन्तु छोड़ नहीं पाते। किसी भी आदत के आभाव में जब मनुष्य स्वयं को असहज महसूस करता है,तब वह आदत उसकी कमजोरी बन जाती है। आदतें क्या हैं ,आदतें दो प्रकार की  होती हैं ,एक अच्छी आदतें ,दूसरा बुरी आदतें। परन्तु आदतें अच्छी हों या बुरी  उनका गुलाम बन जाना उचित नहीं।

वास्तव में होता क्या है ,कि कोई मनुष्य किसी आदत को छोड़ना भी चहता है पर छोड़ नहीं पाता ,सोचता है की लोग क्या कहेगे ,मनुष्य स्वयं के बारे से ज्यादा  समाज के बारे में सोचता है. मनुष्य को समाज की चिंता अधिक होती है। मनुष्य अगर स्वयम में बदलाव भी लाता है तो समाज को ध्यान में रखकर लता है।
आज के आधुनिक समाज में अपना प्रभाव दिखाने के लिए कई बुरी आदतों को अपना लिया जाता है ,अंजाम चाहे जो भी हो,उदाहरण  के लिए ,अरे यार कुछ तो अपना लाइफ स्टाइल बदलों अगर मेरे पास इतना पैसा होता ,तो मेरा लाइफ -स्टाइल देखते बिलकुल बदल जाता। मेरे तो पैर ही जमीन पर नहीं पड़ते। दो -चार नौकर गाड़ीयाँ तो जरुर रखता समाज में आज तुम्हारी पहचान है। बदलाव तो ला…

"मात्र भूमि की शान में "

महात्मा गाँधी प्यारे बापू , अंहिंसा के  पुजारी को शत-शत नमन। भारत की आन में ,मात्रभूमि  की शान मे, नतमस्तक ,नतमस्तक ,नतमस्तक। भारतवासियों के हृदय में माँ तुल्य पूजनीय है भारत , वात्सल्य के समुद्र का सैलाब है भारत।
भारत सद्विचारों से हरा- भरावृक्ष है, सरलता- सादगी है श्रृंगार इसके ,  सरलता पवित्रता का सूचक है , सरल है ,  कमजोर नहीं ,  शस्त्र नहीं शास्त्रों को देता है प्राथमिकता। 



कपट से दूर ऊच्च संस्कारों के आदर्श हैं  इसका मूल , मात्रभूमि के सपूतों में है वो आग दुश्मन को मुह तोड़ देने को जवाब।


सिंह की दहाड़ ,कंकड़ नहीं पहाड़ है ,चिंगारी नहीं वो आग है।  तीर नहीं तलवार है ,शाखा नहीं वृक्ष है ,बूंद नहीं समुद्र है। तूफान है,सैलाब है ,शस्त्रों का है पूरा ज्ञान ,दुश्मनों के छक्के छुड़ाने को रहते हैं सीना तान ,  चिंगारी नहीं आग है।  अद्भुत है मेरा भारत ,अतुलनीय पर्वत सा विशाल हृदय है ,सूर्य सा तेज , पर नहीं किसी से द्वेष ,  विश्व में भारत की है अपनी अलग पहचान , भाई -चारे संग ,धरती पर स्वर्ग बनाने का संदेश ,   अदभुत , अतुलनीय है मेरा देश।


मेरा भारत है  महान , हमी से है इसकी शान ,     समस्त भारत वासी बने इसकी आन …
हँसना  संतुष्टता की निशानी है। 
 खुश रहने का सबसे बड़ा मंत्र है संतुष्टि . प्रसन्नता ख़ुशी केवल भाव ही नहीं अपितु जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। ख़ुशी या प्रसन्नता को बेचा या खरीदा नहीं जा सकता। .ख़ुशी या प्रसन्नता को बेचा या खरीदा नहीं जा सकता। ख़ुशी प्रसन्नता सृष्टिकर्ता द्वारा दिए गए अनमोल रत्न हैं। ख़ुशी को जितना लुटाया जाए उतनी बढती है। ख़ुशी या प्रसन्नता वातावरण को सुंदर बनाते हैं। शुभ शक्तियों का सांचर होता है। 
  कुछ लोग मानते हैं की ख़ुशी सिर्फ धन -दौलत वालों के पास होती है। परन्तु यह सत्य नहीं है। धन -दौलत वाले अधिक चिंता ग्रस्त रहते हैं ,उन्हें इस बात  की चिंता रहती है। की उनकी दौलतकहीं चोरी न हो जाये नुकसान न हो जाये। हाँ धन -दौलत वालों के पास सुविधाएँ अधिक अवश्य होती हैं परन्तु अधिक सुविधाएँ ही असुविधा का भय का कारण होतीं हैं। जबकि कम दौलत वाला अधिक खुश रह सकता है.। ख़ुशी बाहरी हो ही नहीं सकती, क्योंकि बाहरी वस्तुएं हमेशा रहने वाली नहीं होती जो ख़ुशी आन्तरिक होती है, वेह टिकती है इसलिए कहते हैं खुश रहो सवस्थ रहो ,क्योंकि स्वस्थ मन से सवस्थ जीवन जिया जा सकता है।  अगर हम बच्चों की तर…

"बिचौलियों से अनुरोध इसे व्यापार ना बनाए"

भगवान के बाद यदि धरती पर किसी को दूसरा स्थान मिला है , तो  है  '' चिकित्सक  यानि डॉक्टर ''  इस पद की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए योग्यता को प्राथमिकता   दी जाए ।  ना की नोटों के बण्डल को ।  
 इसकी गुणवत्ता से खिलवाड़ ,स्वयं व् समाज के                                 साथ खिलवाड़ ।