🌺सुस्वागतम् नववर्ष का,पल -पल बदलते नये पल का 🌺

🎉🎉स्वागत करो ,पल-पल बदलते हर नये पल का🎉🎉
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"नया दौर है ,
नया युग है
"नये युग की नयी -नयी आशाएँ
नये रूप में,नये रंग में,
नये अरमानों के पंख लिये
नये ढंग से इतिहास रचने को
नयी-नयी अभिलाषाएँ।
दिवस बदलेगा ,माह बदलेगा,वर्ष भी बदलते जायेंगे
युग बदलेगा , समय का पहिया आगे बड़ता जायेगा"

नवयुवकों स्वागत करो ,पल -पल बदलते हर नये पल का
आगे बड़ता हर क्षण नया है ,
आनन्द,का हर क्षण मूल्यवान
हर क्षण आनन्द और उत्साह का
सत्यता के संग ,परिश्रम लगन,और जुनून की
आत्मिक पूँजी, है हर पल सफलता की कुंजी

सुस्वागतम् हर नये वर्ष का
समय है ये बड़े हर्ष का

माता ,बहनों के पूजन से होता है शुभारम्भ
" भारतवर्ष " के नववर्ष का ,नवसंवत्सर का

माता ,अन्नपूर्णा ,लक्ष्मी,सरस्वती और दुर्गा
आध्यात्मिकता के बीजों से सींचित
सादगी,सदाचार ,और सुख -शान्ति का सन्देश लिये
किसानों हमारे अन्नदाताओं की कड़ी मेहनत जब रंग लाती
खेतों में जब फ़सल लहलहाती
तब भी भारत के वासी नववर्ष का जश्न मानते हैं ।




*सफलता कभी भी परिस्थितयों की मोहताज नहीं होती
आज तक जितने भी सफ़ल लोग हुये हैं, उन सब ने विपरीत परिस्थियों से लड़कर ही सफलता पायी है *

* उड़ने को पँख तो मिले थे, पँखों में उड़ान भी थी ,परन्तु उड़ने को खुला आसमान नहीं था
विचारों के समन्दर मैं पंख फड़फड़ाते थे ,विचार उड़ान तो भरते थे, परन्तु दायरे सिमित थे *

निःसंदेह यह बात तो सत्य है ,कि डिजिटल दुनियाँ ने लेखक, लेखिकाओं को , लिखने को खुला आसमान दिया
विचारों और भावों को प्रकट करने को भव्य खुला आकाश

दिल से आभार और धन्यवाद ,"prachidigital.in " का जिसने देशभर से 24 लेखकों का चयन किया

उन 24 लेखकों की 24 कहानियों की "पंखुड़ियाँ "

Prachidigital.in publish प्रकाशित करने जा रहा है e-book "पंखुड़ियाँ"

देश भर के "चौबीस लेखक ,लेखिकाएं , और उनकी चौबीस कहानियाँ

" चौबीस लेखक ,चौबीस कहानियाँ "" पंखुड़ियाँ"

दिन :-24, जनवरी समस्त भारत देशवासी पढ़ेंगे e- book " पंखुड़ियाँ"







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" अमीरी"


 अगर विचार ही संकीर्ण हों तो ,
 कोई क्या करे
  विचारों की अमीरी ने अपने जुनून और
  कर्मठता के बल पर ,कई लोगों को बादशाह
  बना दिया इतिहास इसका गवाह है ।

निर्धनता को दूर किया जा सकता है
धनकमा कर ..निर्धन होना इतना बुरा नहीं
क्योंकि परमात्मा द्वारा मनुष्य को
आत्मबल की जो अमूल्य सम्पदा प्राप्त है
उसके उचित उपयोग द्वारा निर्धन धनवान बन सकता है

परन्तु ग़रीबी ........ग़रीबी तो पनपती है मनुष्य के मन में
अगर कोई अमीर होना ही ना चाहे तो कोई क्या करे
हाँ धन की अधिकता संसाधनों मई वृद्धि अवश्य करती है ।

धन का क्या है कहीं ज़्यादा कहीं कम
अमीर बनिये दिल के अमीर ,
खाता हर कोई रोटी ही है
निधन सबका निश्चित है
अमीर और ग़रीब जाती सबकी झोली ख़ाली है ।


💐इन्तजार💐


💐इन्तजार नहीं-नहीं..... मुझे किसी का भी इन्तजार नहीं
पर शायद दिल के किसी के कोने में
करता तो हूँ, मैं भी किसी का इन्तजार
पर किसका ,नाम नहीं जानता उसका
दरवाजे पर खड़ा अक्सर झाँकता रहता हूँ
कोई नहीं है, फिर भी ना जाने किसका
इंतजार रहता है ।
शायद कोई मीठी सी महक 💐
मन्द मधुर समीर का झोंका
कोई मीठा सा एहसास दे जाये
कोई आये मुस्कराहटों की बौछार ले आये
हम भी मुस्करायें, वो भी मुस्करायें
सारा जहाँ मुस्कराना सीख जाये
नहीं किसी भी चेहरे पर
उदासी की झलक नज़र आये
सभी गिले-शिकवे ख़त्म हो जायें
आये तो अब बस बहारों के ही मौसम आयें
इन्तजार मैं रहता हूँ,अक्सर
कोई ईर्ष्या,द्वेष लोभ, अहँकार जैसी
जहरीली बिमारियों को खत्म करने की
दवा ले आये।
अब जो भी ईंसान नज़र आये
निस्वार्थ प्रेम की औषधी संग
जीने की वज़ह लेकर आये ।।💐💐💐💐💐💐💐💐
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐






*सुकून *


**** मेरे पड़ोस में रहने वाली बूढ़ी अम्मा ,दिन भर घर के द्वार पर ही नज़र आती ।
सब गली मोहल्ले वाले अपने काम से आते-जाते बूढ़ी अम्मा का आशीर्वाद जरूर लेते ।
पहले तो अम्मा द्वार पर खड़ी रहती,पर जब थक जाती तब
बूढ़ी अम्मा अपने घर के द्वार के बाहर अधिकतर एक छोटी सी चौकी लगाकर बैठ जाती ।
आते -जाते सबको देखती रहती ,कभी किसी के पास फुर्सत होती तो दो पल अम्मा के पास खड़ा होकर बातें भी कर लेता ,
बस अम्मा का सारा दिन यूँ ही बीत जाता ।
हम सब आस-पास के गली -मोहल्ले वाले अम्मा को न्यूज़ रिपोटर भी कहते ,कयोंकि अम्मा को कोई काम तो था ,नहीं और सत्तर साल की उम्र में उनके बस की बात भी नही थी कोई काम करने की ।
सुबह सवेरे ही अम्मा रोज का नियम कर्म करके नाश्ता करके बाहर आ जाती ,  और चलते-फिरते कोई न कोई उन्हें कुछ न कुछ जो भी कुछ अलग हो रहा होता आस-पास तो बता देता ,जैसे कोई बीमार है, कोई कहीं बाहर घूमने गया है ,किसी ने कुछ नया खरीदा ,किस की बहू कैसी है, वगैरा-वगैरा  आस-पास देश दुनियाँ में क्या कुछ नया हो रहा है खबर दे देता ।
अम्मा सबकी सुनती ,फिर अपने ढंग से सबको बताती रहती।
हमें भी इंतजार रहता कि अगर कुछ अलग होगा तो अम्मा हमें खबर दे ही देगी ।
जब कभी अम्माँ का स्वास्थ्य ख़राब होता तो वो घर से में ही आराम करती , यूँ तो सब लोग इस बात से चिड़ते थे की अम्मा सबको टोकती है कहते पता नहीं कब इस अम्माँ से पीछा छूटेगा  पर जब एक दिन अम्माँ ना दिखती तो बेचैन हो जाते
  कई परिवारों में कई बार अम्माँ की व किलग्रैम्ज़ से विवाद हो जाता ,कभी देवरानी ,जेठनी कभी सास बहू ,नन्द-भाभी वग़ैरा
  अब तो सब को पता चल हुआ था की अम्माँ इधर की उधर बातें करती हैं चाहे वो अपनी जंग सही होती होंगी पर उनकी
बातें सुन के कई लोग ग़लत मतलब खाते थे ।
एक बार तो अम्माँ ने हमारे ही घर में झगड़ा कर दिया ,हुआ यूँ की अम्माँ ने मेरे पति देव को भड़का दिया की तेरी बीवी तो रोक शाम को बाज़ार जाती है और ना जाने कितना -कितना समान ख़रीद कर लाती है ।
जबकि जीमेल डोनो पति-पत्नी को पता था की अम्माँ किसी भी बात को भूत बड़ा कर कहती है
पर कभी -कभी बुद्धि खराब हो जाती है और बस ....एक दिन मेरे पति देव भी किसी बात से पहले से hi परेशान थे उस पर अम्माँ ने थोड़ा मिर्च माल्स खा कर कह दिया की मैं अभी-अभी आयी हूँ बाज़ार से और भूत समान ख़रीद कर लायी हूँ ,
मेरे पतिदेव तो घर में घुसते ही मुझ पर भड़कने लगे और कहने लगे की उड़ा लो मेरी मेहनत की कमाई को तुम में सारा दिन पाटूँ की तरह घर से बाहर मेहनत करता हूँ और तुम दिन भर घर आराम से रहती हो और शाम को चल देती हो मेरे पैसे उड़ाने मज़े हैं तुम्हारे ।
मैंने अपने पति देव के आगे एक ग्लास ठंडा पानी रखा ,पानी पीते ही वो थोड़ा शांत हुए

मैंने बोला हाँ मैं शाम को बाज़ार जाती हूँ ,पर घर की ज़रूरत का सामान लेने घर का सामान भी आ जाता है और मेरा चलना भी । अगर आपको बुरा लगता है तो कल से बाज़ार नहीं जाऊँगी ,जब आप आओगे तब आपके साथ ही ले आया करेंगे घर का सामान , पति देव बोले अरे नहीं कुछ काम तुम भी कर लिया करो घर का दामन तो तुम ही लाया करो ....
हम दोनो ही हँसने लगे ...
हम सोनी ने अम्माँ जी के घर का दरवाज़ा खटखटाया अम्माँ आयी ,यूँ तो अम्माँ बड़े प्यार वाली थी हमें अपने पास बिठाया
बोली ख्या खाओगे ,हमने बोला अम्माँ कुछ नहीं बस आप बस इधर की बात उधर मत किया कीजिए
अम्माँ बोली मई जानती हूँ ये मेरी हालत आदत है कर करूँ ,मेरे भू बेटे तो मेरे पास रहते नहीं बस टेंशन में सब कर देती हूँ
हमने बोला अम्माँ कल से रोक शाम को हम आपसे मिलने आयेंगे आपके पास बैठेंगे ,अम्माँ ने  डोनो के सिर ख़ुशी से चूम लिए ,अम्माँ बहुत ख़ुश हुई आज उनके चेहरे पर सुकून दिखायी दे था था ।
शायद हमारे बड़े बुज़र्गों को दो हम बच्चों से कुछ नहीं चाहिये बस दो दो बोल प्यार के एर हम बच्चों का साथ चाहिये।

,


सफ़र

सफ़र की शुरुआत
बड़ी हसीन थी
हँसते थे ,मुस्कुराते थे
चिड़ियों संग बातें करते थे
सपनों की ऊँची उड़ाने भरते थे
हर पल मुस्कुराते थे
वो बचपन के दिन भी कितने अच्छे थे
सफ़र ये कैसा सफ़र
प्रतिस्पर्धा की दौड़ मैं
चेहरे की मुस्कान छिन गयी
चिंता की रेखाएँ चेहरे पर पर बोलती हैं
जाने क्यों हम बड़े हो गए
मन में हज़ारों द्वेष पल गए
संग्रह करते -करते हम
विभाजित हो गये
अपराधी हो गए
व्यवसायिक हो गए
व्यवहारिकता स्वार्थी हो गयी
इंसान तो रहे ,इंसानियत गुम गयी
जीवन एक
सफ़र है,सब को है ज्ञात
सफ़र में सुविधाओं के लिए
धरती लहुलोहान हो गयी
मिट्टी के तन की मिट्टी पहचान हो गयी
फिर भी अकड़ ना गयी
जिस जीवन की ख़ातिर आतंक फैलाया
वही आतंकवाद जीवन का विनाश कर रहा
जीवन एक सफ़र है किसी का लम्बा
किसी का छोटा ,
सफ़र का अन्त तो निश्चित है
फिर क्यों आतंकवाद से सफ़र का मज़ा किरकिरा करना
हँसना ,मुस्कराना जीवन के सफ़र को
आनंद मयी यादगार और प्रेरणास्पद बनाना ।





"सकरात्मकता का व्रत"

"जब से मुझे सकारात्मकता के बीज

मिले हैं मैं तो मालामाल हो गया

अरे, ये तो बहुत कमाल हो गया 

अब  मैं सकारात्मकता के बीज

डालकर सकारात्मकता की फ़सल

उगा रहा हूँ ,नकारात्मकता की सारी

झाड़ियाँ काट रहा हूँ "

एक व्रत जो मैंने हर वक़्त लिया है ठान

आव्यशक्ता से अधिक में खाता नहीं 

अन्न को दुरुपयोग होने से बचाता हूँ

सिर्फ़ अन्न का ही नहीं

अनावश्यक विचारों को स्वयं में

समाहित होने देता नहीं

नकारात्मक विचारों को स्वयं से

दूर रखने का लिया है

मैंने जीवन भर का व्रत ठान

स्वच्छ निर्मल जल में हो

प्रतिबिम्बित यही मेरी  पहचान 



"मुस्कराना सदा मुस्कराना है"

 
💐संसार के रंगमंच पर
मुझे अपना किरदार बखूबी
निभाना है ।💐
खुशी हो या ग़म
मुस्कराना सदा मुस्कराना है
माना की जीवन एक पहेली है
ये पहेली ही तो मेरी सहेली है ।

जन्म और मृत्यु का खेला है
जन्म और मृत्यु के बीच का
जीवन ,बचपन,जवानी,बुढापा
उतार-चढ़ाव का रेला है ।
जीवन है तो जीना है
कर्मों के बल पर अपना
आशियाना तो बनाना है पर उस पर
अधिकार नहीं जताना है
क्योंकि एक दिन छोड़ कर आशियाने को तो
जाना है ।
जीवन का सफ़र
सुख-दुख का मंजर है
जो जीता वही सिकन्दर है
जो उलझा ,वो उलझता चला गया
सफ़र का आनन्द लेना है
जीने का अंदाज सबका
अपना-अपना है ,कोई सबकुछ
खोकर भी मुस्कराता है
कोई सब कुछ पाकर भी रोता रहता है
जीवन एक सफ़र है
किसी का छोटा ,किसी का लम्बा सफ़र है
सफ़र में तमन्नाओं का बोझ कम रखो
सफ़र हल्का -फुलका और मजेदार होगा
और वापिसी में उतना ही आराम होगा ।💐

**आओ साईकिल को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनायें**


आओ बच्चों इस *बाल दिवस*पर
 एक प्रण निभायें,चलो साईकिल चलाये
सिर्फ बाल दिवस ही नहीं ,
प्रतिदिन का यह नियम बनाये
  ** साईकिल चलायें**
 साईकिल को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

   **हाथ हों हैण्डल पर
    पैर हों पैंडल पर
    दृष्टि हो, चहुँ ओर,
    आओ जीवन की 
       रफ़्तार बढ़ायें ।
 तन-और मन को स्वस्थ बनायें
शुद्ध वातावरण में श्वासों की पूंजी बढ़ायें 
पेट्रोल, डीज़ल की जहरीली गैसों से 
वायुमण्डल को प्रदूषित होने से बचाएं।

*परमात्मा ने यह धरती हम मनुष्यों
के रहने के लिये बनायी ,और हम मनुष्यों ने
अपने लोभ और स्वार्थ में इस धरती का
हाल बुरा कर दिया।
आओ बच्चों ,धरती माँ को प्रदूषण मुक्त बनायें
धरा को स्वर्ग सा सुन्दर, बनायें 
 पुष्पों की कतारें सजाये, 
  फलों के वृक्ष लगायें ,
 खेतों में पौष्टिक अनाज की पौध लगायें
प्राकृतिक व्यायाम के साधन अपनायें,
व्यायामों को महँगे खर्च से छुटकारा पायें
आओ तन-मन और वायुमण्डल को स्वस्थ बनाये
आओ साईकिल को अपने दिनचर्या का
 महत्वपूर्ण  हिस्सा बनाये ।




*आखिर क्यो हुआ ?*वायु प्रदूषण*

 
 बड़ा ही चिन्तनीय विषय है ,
 वायु प्रदूषण ,आखिर क्यों हुआ ये वायु प्रदूषण
 इसका जिम्मेदार भी मनुष्य स्वयं ही है।
 सृष्टिनिर्माता द्वारा धरती पर प्राकृतिक रूप से मनुष्यों के 
 उत्तम स्वास्थ्य हेतु सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई गयी  ।
 प्रकृति की अनमोल सम्पदायें ,वृक्ष, नदियाँ ,और सबसे महत्वपूर्ण साँस लेने के लिये शुद्ध स्वच्छ वायु ,जो प्रकृतिक रूप से सम्पूर्ण वायुमण्डल में है ।
यानि कि सृष्टिकर्ता द्वारा मनुष्यों के रहने के लिये सम्पूर्ण सुख-सुविधाओं से पूर्ण सृष्टि का निर्माण किया गया ,और कहा गया जाओ मनुष्यों धरती पर राज करो ।
परन्तु मनुष्यों को तो देखो आधुनिकता की दौड़ में ,या यूँ कहिये आगे बढ़ना प्रकृति का नियम है । किसी भी देश की प्रग्रति और उन्नति नित-नये अविष्कार करने में है ,सुख-सुविधाओं के साधनों में बढ़ोत्तरी कोई बुरी बात भी नहीं है ,परन्तु ऐसी भी प्रग्रति किस काम की ... या सुख-सुविधओं के साधनों में इतनी भी बढ़ोत्तरी किस काम की जो स्वयं को बीमार कर दे ......
जरा सोचिए...... सृष्टिनिर्माता द्वारा प्राप्त वायुमण्डल जिससे हम मनुष्यों को प्राणवायु मिलती है .... उसी प्राणवायु को हमने जहरीला बना दिया .....दोषी कौन है ? दोषी हम सब मनुष्य स्वयम ही हैं ।
वाहनों की अधिकता ,फैक्टरियों सर निकलता धुआं 
सर्वप्रथम तो वाहनों की अधिकता पर रोक लगनी चाहिये 
एक घर मे एक से अधिक वाहन वर्जित होना चाहिये 
बच्चों को प्रारम्भ से ही साईकिल चलाने की प्रेरणा देनी होगी इससे एक तो वायु प्रदूषण नहीं होगा और शरीर भी स्वस्थ रहेगा ।
शीघ्र अति शीघ्र अपने वायु मंडल को स्वस्थ बनाइये 
पेट्रोल,डीजल वाहनों का उपयोग अत्यधिक आवयशक हो तभी कीजिये।
वरना ये धरती मनुष्यो के रहने लायक नही रहेगी।
जिम में जाकर साइकिल चलाना स्टेटस सिंबल बनाने से अच्छा ,खुली हवा में साइकिल चलाइये ,ओर सबको प्रेरणा दीजिये ।




"देवों की धरती"

 देवों की भूमि "उत्तराखण्ड"
 "भारत"के सिर का ताज
गंगोत्री ,यमनोत्री,बद्रीनाथ,केदारनाथ
आदि तीर्थस्थलों का यहीं पर वास
पतित ,पावनी निर्मल ,अमिय माँ
गँगा का उद्गम गंगोत्री .. से 
हरी की पौड़ी ,हरिद्वार के घाटों में बहती
अविरल गँगा जल की धारा 
जन-जन पवित्र करता है अपना
तन-मन ।
भारत को सदा-सर्वदा रहा है 
जिस भूमि पर नाज़, वहीं उत्तराखण्ड 
पर बन रक्षा प्रहरी खड़ा है विशालकाय 
पर्वत हिमालय .....
हिमालय पर है, हिम खण्डों का आलय
हिमालय पर्वत पर बहुत बड़ा संग्रहालय
दुर्लभ जड़ी बूटियों के यहाँ पर पर्वत 
पवित्र नदियों का होता है, यहीं से उद्गम।
कल-कल बहते जल की सुरीली सरगम
प्रवित्रता की अविरल धाराओं से शीतल तन-मन
देवों की भूमि ,उत्तराखण्ड
ऋषियों की धरती ऋषिकेश से करती हूँ
मैं सबका सुस्वागतम।

जीवन और प्रलय

हाँ-हाँ -हाँ मैं नारी ही हूँ
सौंदर्य की प्रतिमूर्ति हूँ ।
मैं नारी ही ,माँ, बहन,बेटी भी हूँ ।
सिंह पर सवार हूँ ,
सिंह की दहाड़ हूँ
विशलकाय पहाड़ हूँ ।
अबला नहीं मैं सबला हूँ
गुलाब हूँ, काँटों के बीच सुरक्षित हूँ
चाँद हूँ, आफ़ताब हूँ,
सूर्य की आग भी हूँ ।
राजे ,महाराजे वीर,बलशाली
योद्धाओं की मैं ही जननी हूँ।
मैं नारी,नहीं बेचारी
मुझमें है शक्तित्व,
 मुझसे ही मिलता है समस्त
जगत को अस्तित्व
पाकर मुझसे व्यक्तित्व
 पौरुष के मद में ,मुझ
पर ही व्यंग कसे है
 नारी के बलिदानों
से इतिहास भरे हैं।
प्रेरणादायक कथा,कहानियों
के बीज डाल-डाल कर महापुरुषों
के शौर्य रचे हैं "मैने "
मैं नारी हूँ, सहनशीलता की प्रतिमूर्ति हूँ
मैं नारी माँ गँगा  की तरह
निरन्तर बहता हुआ निर्मल जल हूँ
मैं अगर जीवन हूँ,तो मैं ही प्रलयकाल भी हूँ
मैं नारी हूँ ,जन्म हूँ ,तो मृत्यु भी हूँ।





💐मेरा मज़हब मोहब्बत💐

*क्या करूँ ,मेरा तो मज़हब ही मोहब्बत है
मोहब्बत के सिवा मुझे कुछ समझ ही न आये *
तो मैं क्या करूं ?

"हम तो मोहब्बतें चिराग जलाये बैठे रहेगें
चिरागों से नफरतों के अँधेरे दूर होते रहेंगे
चिराग तो जलते ही हैं ,जहाँ को रोशन करने के लिये
अब कोई अपना मन जलाये तो हम क्या करें
किसी को समझ ना आये तो हम क्या करें"

मोहब्बत की आग तो चिराग़े दिलों में ही
जला करती है, यूँ तो *ये*मोहब्बत की आग दिलों को
ठंडक देती है , पर कभी-कभी दिलों को जला
भी देती है।

"आग है तो ,चिंगारियाँ भी होंगीं ,
चिंगारियाँ होंगीं तो ,आग भी होगी
आग होगी तो ,जलन भी होगी
पर एक खूबसूरत बात आग के साथ
रोशनी भी आपार  होगी"
*मोहब्बते चिराग यूँ ही तो नहीं जला करते
सूरज भी हर-पल जला ही है
उजालों की खातिर ,जलना ही पढ़ता है
हासिल कुछ हो या न हो,चिराग जलता ही है
अन्धकार दूर करने के लिये है**

*मोहब्बतों का कोई मज़हब नहीं होता
  मज़हब तो ,विचारों और विवादों का होता है
 सबसे बड़ा मज़हब तो मोहब्बत ही है
"जिसमें न कोई हिन्दू,ना मुसलमान ,न ईसाई होता है
होता है तो सिर्फ इन्सान होता है ,सिर्फ इंसान होता हैं"***

💐💐धरती को स्वर्ग से सुंदर तो बनाइये💐💐


आओ-आओ सखियों
हमारे प्रभु श्री राम ,लक्ष्मण,माता सीता,
हनुमान जी के साथ चौदह वर्ष बाद
वनवास से लौट रहे हैं ।
मन हर्षित ,प्रफुल्लित है ,जन-जन के प्रिय
श्री राम ,जानकी अयोध्या लौट रहे हैं ।
अमावस्या की काली घनी अंधेरी रात थी
घर, आँगन ,गली ,मोहल्ले दीपों के प्रकाश से प्रकाशित किये गये , प्रकाश की इतनी सुंदर व्यवस्था हुई
की लक्ष्मी भी हर्षित हुई घर-घर में लक्ष्मी जी की कृपा दृष्टि हुई, सुख-समृद्धि धन-धान्य से सब परिपूर्ण हुए,
प्रसन्नता वश  आतिशबाजी ,व फुलझड़ियां भी प्रज्ज्वलित की गयी
वो सतयुग था ,तब से अब तक दीपावली का त्यौहार कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हर्षोल्लास से मनाया जाता है ।
  पर ये क्या ?कलयुग में दीपावली यानि अपने ईष्ट के स्वागत की दीपों वाली रात को कितना जहरीला और दिखावटी रूप दे दिया है । ईर्ष्या वश सब एक दूसरे को देखकर जलभुन रहे हैं ,दिलों में प्रेम नहीं और मिठाइयां खिला रहे हैं ।
सर्वप्रथम घरों की और अपने-अपने व्यवसायिक स्थलों की साफ-सफाई करते  है ,फिर अनगिनत जहरीले पटाखे जलाकर अस्वच्छता फैलाते हैं वातावरण भी दूषित ....हाय- हाय ये कैसा स्वागत ,ये कैसी दीपावली ।
माना कि त्यौहार का मौका है,दिल में उमंग, उत्साह भी आवयशक है । परस्पर प्रेम से सब गिले-शिकवे मिटाइये ।
बाहर की स्वच्छता के साथ-साथ भीतरी स्वच्छ्ता भी आवयशक है ,मन में मैल भरा रहा तो भगवान कहाँ आयेंगे।
दीपावली का त्यौहार अवश्य मनाईये ।
लक्ष्मी जी का स्वागत करिये, पर अनादर नहीं ,बारूद के पटाखों से वातावरण को दूषित कर आज का समाज जहरीली वायु मे स्वयं तो साँस लेता है ,और चाहता है, की उसके ईष्ट भी इस जहरीले वातावरण में आयें ।
नहीं भई नहीं ,परमात्मा क्यों आयेगा इतने जहरीले युग में
💐वो तो स्वर्ग में रहता है, जहाँ सब और निर्मलता है 💐💐
परमात्मा का स्वागत करना है तो पहले तन ,और मन को स्वच्छ करिये वातावरण में रासायनिक जहर को घुलने से रोकिए ।
पहले धरती को स्वर्ग से सुंदर तो बनाइये फिर दौड़े -दौड़े चले आयेंगे भगवान ......💐💐💐

💐💐दिव्य प्रकाशमय दीपावली💐💐


त्यौहार:-
        त्यौहार यानि,हर्षोल्लास, उमंग,उत्साह,
दीपावली का त्यौहार,दिल में नया उत्साह,नयी उमंग
सबसे बड़ा काम घर की साफ़-सफाई ।
माँ पास आकर बोली,कल शनिवार है,परसों रविवार, कल और परसों तेरी,आफ़िस की छुट्टी है, ये नहीं की देर तक सोती रहे,कल जल्दी उठ जाना चार दिन बाद दीवाली है,अभी तक ढंग से साफ़-सफाई भी नहीं हुई ,कल सुबह काम वाली बाई के
साथ मिलकर अच्छे से सफाई करवा लेना ।
बेटी मीता बोली हाँ माँ ,मैं भी यही सोच रही थी, फिर सजावट भी तो करनी होगी ,
माँ पता है,बाज़ार में बहुत सूंदर-सूंदर सजावट का सामान आ रखा है।
इतने में दो पड़ोसी बच्चे आ गये ,कहने लगे बुआ जी आपने कहा था ,जब अगले साल हम आठ साल के हो जायेंगे ,तब आप हमें पटाखे दिलायेंगी ।
मीता बोली पटाखे ?
बच्चे बोले बुआ आपने बोला था अगले साल तुम और बड़े हो जाओगे तब तुम्हें बहुत सारे पटाखे दिलाऊंगी ।
मीता बुआ कहती है, पटाखे तो मैं तुम्हें दिल दूँगी ,लेकिन बताओ,पटाखे जला कर तुम्हें फायदा क्या मिलेगा?
बच्चे बोले बुआ जी, बता है ,बजार में कितने अच्छे-अच्छे पटाखे आ रखे हैं।
दीदी बोली मुझे सब पता है, पर ये बताओ पटाखे जलाकर तुम्हे फायदा क्या मिलेगा ?
बच्चे बोले ,बुआ पटाखे जलाकर बहुत अच्छा लगेगा ,मेरा एक दोस्त है,ना उसके पापा तो उसके लिये बहुत सारे पैसों के पटाखे ले भी आये हैं।
बुआ मीता बोली अच्छा ,फिर तो उन्होंने पटाखे लाकर अपने पैसे तो बर्बाद करे ही ,साथ मे वातावरण को दूषित करने का सामान भी ले लिया ।
तुम जानते हो बच्चों पटाखों में अनगिनत जहरीली रसायन होते हैं , और जब हम उन्हें जलाते हैं तो उनमें से जहरीले रसायनों का धुआँ हमारे आस-पास के वातावरण को दूषित करता है,और जब हम साँस लेते हैं तब हमारी साँसों के साथ हमारे शरीर में जाकर हमे भी बीमार करता है, इन पटाखों से बहुत ही जहरीले रसायन निकलते हैं बच्चों ।
बच्चे :-बुआ जी आप हमें पटाखे नहीं दिलाना चाहती तो साफ-साफ मना कर दो।
बुआ को लगा बच्चे अब तो नाराज़ ही हो रहे हैं,
बुआ बोली सुनो बच्चों मैं तुम्हें पटाखे दिलाऊंगी ,जिसमें थोड़ी सी फुलझड़ियां,होंगी चरखी होगी ।
इस बार की दीवाली को हम बहुत शानदार और अलग ढंग से मनायेंगे ,बहुत मजा आयेगा ,आज मुझे घर की साफ-सफाई करने दो । दीपावाली का त्यौहार  हम एक साथ मनायेंगे।
  दिपावली का दिन था, घर आँगन स्वच्छ ,थे घरों में यथासम्भव सजावट कर ली गयी थी ,
मिट्टी की सौंधी महक वाले दियों से आँगन में प्रवेश करते ही सौंधी-सौंधी खुशबू आ रही थी ।
आस-पड़ोसी और सगे-संबधियों का दीपावली की बधाई का सिलसिला चल रहा था ।
इतने में बच्चे भी आ गये ,हैप्पी दीपावली कहकर बुआ जी को घर की सजावट देखने लगे ।
   बुआ जी आपको अपना वादा याद है ना, हमें पटाखे दिलाने है । बुआ बोली हाँ-हाँ सब याद है ,चलो आ जाओ पहले कुछ नाश्ता कर लो । नाश्ता भी हो गया था ,बुआ जी अपने काम मे लगी हुयी थी ,इधर बच्चे परेशान की बुआ जी कब हमें पटाखे दिलायेंगी ।
बच्चे इतने बैचैन थे की बुआ को किसी से बात भी ढंग से नहीं करने दे रहे थे । आखिर बुआ जी बोली बच्चों आज दीपावली हम कुछ अलग ढंग से मनायेंगे ,चलो पहले बाजार चलते हैं, कुछ सामान खरीदते हैं ।
बच्चे और बुआ जी निकल पढ़े दीपावली की खरीदारी करने ।
सबसे पहले तो बुआ जी सड़क के किनारे बैठे मिट्टी के दिए लगाये बच्चे के पास रुकी सोचा कुछ दिये ले लूँ ,बुआ ने पैसे दिये दिये भी ले लिये ,फिर न जाने बुआ को क्या सूझी उस बच्चे से पूछ बैठी, बेटा तुम दीवाली कैसे मनाओगे ,पटाखे नहीं जलाओगे ,तुम्हारा मन नहीं करता पटाखे जलाने का बच्चा बोला ,नहीं मैडम जी हमारे पास कहाँ इतना समय की हम सोचे की हम पटाखे कब जलायेगें ,हम तो बस खुश हैं ,दो वक्त की रोटी के जुगाड़ मे ।
पिताजी हमारे हैं नहीं ,हमें पता नहीं कहाँ रहते हैं , माँ हैं, दो छोटी बहने हैं ,बहने घर पर हैं,माँ भी किसी के घर पर काम करती है । रात को थके हारे घर जायेंगे कुछ खायेंगे और सो जायेंगे।
   थोड़ी आगे चलकर एक पटाखों की दुकान आयी ,बुआ जी ने थोड़े पटाखे लिये ,जिसमे ,फुलझड़ियाँ और ,फिरकी साधारण पटाखे थे ,फिर मिठाई वाले की दुकान से मिठाई और बहुत सारा जरूरत का सामान खरीदा ।
बच्चे एक बार को बोले बुआ जी आपने पटाखे तो भुत कम लिये ,बुआ बोली पटाखे तो सब धुंआ हो जायेंगे ,तुम्हारी ख़ुशी के लिये थोड़े पटाखे ले लिये हैं ।
 बच्चों और बुआजी ने जो-जो खरीददारी करी थी ,वह सारा सामान उन्होंने गाड़ी में रखा ,और उत्सुकतावश गाड़ी में बैठ गये ,बच्चे खुश थे कि ,घर जाकर मिठाई खायेंगे पटाखे जलायेंगे। गाड़ी चल रही थी इतने में एक बच्चा बोला बुआजी यह रास्ता हमारे घर को तो नहीं जा रहा ,हम कहाँ जा रहे हैं ,बुआजी बोली देखते जाओ हम कहाँ जाते हैं ।
थोड़ी आगे जाकर बुआ जी ने गाड़ी रुकवायी ,फिर बच्चों को भी नीचे उतरने को कहा ,बच्चे गाड़ी से बाहर आ गये ,
दीदी ने सारा सामान बाहर निकाला ,बच्चे बोले बुआजी यहां कौन रहता है ,आपका जानकार ,बुआ बोली तो क्या हुआ जो हम किसी को नहीं जानते ,हम जान पहचान कर लेंगें ।
 इतने में नीची सी छत जिस पर बहुत सा पुराना समान पीडीए था ,कच्चे से कमरे के दरवाजे पर टंगे आधे-अधूरे पर्दे से एक बच्चा झाँकता हुआ दिखायी दिया,उस बच्चे की आँखे बड़ी उत्सुकता से हमें देख रही थी, इतने में अन्दर से दो बच्चे और दरवाजे पर खड़े हो गये ,ऐसा लग रहा था जैसे वो पूछना चाह रहे हों ,आप लोग यहाँ क्यों आये हैं ।
देखते-देखते कुछ बच्चे और कुछ बच्चों की मायें नन्हें मुन्नों को गोद में उठाये बाहर आ गयी ,उनमें से एक बोली क्या चाहते हैं आप लोग यहाँ क्यों आये हैं ,मैंने उन्हें बताया की हम उनके साथ दीवाली की खुशियां बांटना चाहते है ,महिला बोली अरे भेजी कहाँ आप कहाँ हम ।
हमारी दीवाली तो मिट्टी के दियों,खील पतासों ,और ये जो बच्चे फुलझड़ियां जला रहे है ना ,वहीं तक सीमित है ,आप जाइये हमारे बच्चों को ऐसे सपने मत दिखाईये बेकार में इन्हें गलत आदत लग जायेगी।
बाच्चों ने और बुआ जी ने मिठाइयां और पटाखे बच्चों में बाँटने शुरू किये बच्चे बहुत खुश थे ,सारे बच्चे एक दूसरे के साथ खेलने लगे पटाखे जलाने लगे ,बुआ जी ने बच्चों की माँ ओं को कुछ पैसे दिये अच्छे कपड़े बच्चों को दिलाने के लिये ।
सब बहुत खुश थे ,सभी बच्चे ऐसे मस्त हो गये थे काफी देर हो गयी थी ,बुआ जी ने बच्चों को आवाज लगायी ,सभी बहुत खुश थे जाते-जाते सबने एक दूसरे को happy Deepawali भी कहा सब खुश थे।
बुआ जी बच्चे गाड़ी में बैठकर घर जा रहे थे, बुआ जी ने बच्चों से पूछा बच्चों चिंता मत करो घर जाकर और पटाखे जलायेंगे मस्ती केरेंगे । बच्चे बोले बुआ जी आज तो मजा आ गया आज की दीपावली हम कभी नहीं भूलेंगे । अभी तक तो हम सोचते थे की मिठाई खाओ,पटाखे जलाओ हो गयी दीपावली ,आज पता चला कि असली दीपावली तो सबके साथ खुशियों की मिठाइयां बाँटने में और सबको खुश करने में होती है ।



**खूँटी पर बँधी है रस्सी**

खूँटी पर बँधी है रस्सी
एक डोर भवसागर की ओर
दूजी डोर धर्मराज की हाथ ।

धरती पर आया है ,
मुसाफ़िर बन कर
तू यूँ डाले है, धरती
पर डेरा ,जैसे की वापिसी
का टिकट ही न हो तेरा
हर एक का है,वापिसी का टिकट
 जीवन की डोर पहुँच रही है,ना जाने
किस-किस की धर्मराज के ,ओर
मौत की खूँटी पर लटकी है,गर्दन
पैर लटक रहे हैं कब्र पर
उस पर असीमित जिज्ञासाओं का मेला
दुनियाँ का मेला, मेले में हर शख्स अकेला
फिर काहे का तू पाले है,जिज्ञासाओं का झमेला,
क्यों करता है, तेरा-मेरा
दुनियाँ है,एक हसीन मेला
इस मेले से नहीं कुछ ले जा पायेगा
आ हम सब मिलकर अपनत्व के बीज डालें
परस्पर प्रेम की पौध उगा लें
भाईचारे संग प्रेम का वृक्ष जब पनप जायेगा
हमारे इस दुनिया से चले जाने के बाद भी
हमारा नाम रह जायेगा ।
मेले का आकर्षण बढ़ जायेगा
हर कोई परस्पर प्रेम का पाठ पड़ जायेगा ।।💐💐💐💐💐




**💐चाँद का दीदार**


💐* करने को चाँद का दीदार 
 मैंने आकाश की और निगाहें
जो डालीं,  निगाहें वहीं थम गयीं💐*

*आकाश में तो झिलमिलाते तारों** की 
बारात थी ,सितारों* का सुंदर संसार 
असँख्य सितारे** झिलमिला रहे थे।
मानों कोई जशन हो रहा हो *****
झिलमिलाते सितारों के बीच 
चाँदनी बिखेरते चाँद की चमकीली 
किरणें सलौनी और सुहानी।

दिव्य, अलौकिक किसी दूजे जहाँ
की परिकल्पना लिये ,मैं कुछ पल को
वहीं खो गया।
आकाश था,मैं था,सितारों* की बारात थी** 
चाँद की चाँदनी थी ,मानों आकाश के 
माथे पर सरल, निर्मल,सादगी, के श्रृंगार 
की बिंदिया ...
चाँद सी लगा के बिंदिया आकाश
अपने सादगी भरे श्रृंगार से सबको 
आकर्षित कर रहा था ।
सबको अपनी चाँदनी से आकर्षित
करते चाँद कुछ तो खास है तुझमें
जो तेरे दीदार से लोगों के दिलों के फैसले लिये
जाते हैं ।

"महत्वकांशाये"

 * महत्वकांशाएँ*   आकांक्षाएं तो बहुत होती हैं,
   परन्तु जो "महत्व" की "आकांशाएँ" होती हैं
   वो "महत्वकांशाएँ "होती हैं ।

* मैं जानता हूँ, कि तू बहुत महत्वकांशी
 है, ए मानव,तेरी काबलियत पर मुझे
 यकीन है *
"अभी तो तू कदम,दो क़दम चला है,
मैं नहीं चाहता तेरे क़दम रुक जायें।
तू जीत का जशन मनाना चाहता है ,
बहुत प्रसन्न हो रहा है, अभी तो तू एक
पड़ाव पर ही पहुंचा है ,मंजिल पर नहीं।


यही तेरी मंजिल है, ऐसा हो नहीं सकता
अभी तो तुझे बहुत ऊंची उड़ाने भरनी हैं "

उड़ान अभी बाकी है, अभी तो पंख फडफ़ड़ाएं हैं,
मैं जानता हूँ ,तेरी काबलियत,तेरी सोच से भी ऊँची है ।
अपनी छोटी सी जीत पर यूँ ना इतरा।
नहीं तो पाँव वहीं रुक जाएंगे।

"अहंकार का नशा चढ़ जायेगा
अंहकार के नशे मे तू सब कुछ भूल जायेगा"
जीत अभी बाकी है ,उड़ान अभी बाकी है ,
मंजिलें मिसाल अभी बाकी है ।
तेरे करिश्मों से अन्जान ,पर कद्रदान
अभी बाकी हैं ।



** धरती माँ**

 मैं धरती माँ का अपकारी हूँ,
ये धरती न तेरी है, ना मेरी है
ना धरती माँ के लिये कत्ले आम करो
ना धरती माँ का अपमान करो ।
जख्मो से धरती छलनी है ,मत अपने विनाश का
सामान करो ,धरती का सीना जब फट  जायेगा
विनाश ही विनाश हो जायेगा ।

भगवान ने धरती हम मनुष्यों के लिये
बनायी ,धरती का भार मनुष्यों को दिया।

तुम चाहो तो धरती को स्वर्ग बना लो या नरक
मनुष्यों को तो देखो ,अपने बुरे कर्मों
द्वारा धरती को युद्ध भूमि ही बना डाला ।

अरे ये धरती हम मनुष्यों की है ,ये इस धरा का
उपकार है कि उसने हमें रहने के लिये स्थान दिया
जानते तो अग़र धरती ना होती तो हम
*बिन पैंदी के लौटे* की तरह लुढ़कते रहते
प्रकृति के रूप में हमें जो विरासत मिली है
उसका संरक्षण करो , मत इसका भक्षण करो।
अपने हक में तो सब दुआ करते हैं
 काश की सब सबके हित में दुआ
करने लग जाये तो धरती पर स्वर्ग आ जाये ।।



"इस वर्ष विजयदशमी पर, कलयुगी रावणों का अंत करने का निर्णय लें।


*विजय दशमी*
" सच्चाई की बुराई पर जीत का पर्व"
 सतयुग में जब अहंकारी रावण का अत्याचार बढ़ता जा रहा था ,रावण जो परम् ज्ञानी था ,परन्तु अपने अहंकार के मद के नशे में चूर रावण दुष्टता की चरम सीमा को पार करता जा रहा था ,धरती पर साधु,सन्यासी,सरल ग्रहस्थी लोग रावण के अत्याचारों से हा-हा कार करने लगे ,तब धरती को राक्षस रूपी रावण से  पापमुक्त करने के लिये, परमात्मा रामचन्द्र को लीला करनी पढ़ी ,और श्री राम ने लीला करते हुए ,अपनी भार्या सीता को रावण की कैद से आजाद कराने के लिये ,भाई लक्ष्मण ,हनुमान, सुग्रीव,जाववंत, आदि वानर सेना के सहयोग से ,रावण रूपी राक्षस से धरती को पाप मुक्त कराया ।
तभी से आज तक रावण, कुंभकर्ण,और मेघनाद के पुतलों को जला कर गर्वान्वित महसूस किया जाता है ।
 
आज कलयुग में में भी इस विजय दशमी की बहुत महिमा है ,अच्छी बात है । परन्तु कब तक ?
सतयुगी रावण तो कब का मारा गया । प्रत्येक वर्ष रावण के पुतले को जला कर हम मानवीय जाति शायद यह साबित करना चाहती कि रावण तो बस एक ही था ,और तब से अब तक रावण का पुतला जला कर हम बहुत श्रेष्ठ काम कर रहे हैं ,अजी कुछ भी श्रेष्ठ नहीं कर रहे हैं आप लोग , अगर हिम्मत है तो कलयुगी रावणों से धरती को पाप मुक्त करके दिखाओ।
आज कलयुग में मानव रूपी मन में कई रावण पल रहे हैं ।आज भाई-भाई का दुश्मन है ,परस्पर प्रेम के नाम पर सिर्फ लालच ही भरा पड़ा है । कोई किसी को आगे बढ़ते देख खुश नहीं है ,हर कोई आगे बढ़ने की होड़ में एक दूसरे को कुचल रहे हैं ।
आज कलयुग में एक नहीं अनगिनत रावण धरती पर विचरण कर रहे हैं ,अगर करना है तो इन रावणों का अंत करो
आज के युग मे सिर्फ रावण के पुतले फूँकने से कोई लाभ नहीं होगा।
और कोई भगवान नाराज़ नहीं होंगे ,अगर इस वर्ष हजारों रुपये के रावण, कुंभकर्ण,और मेघनाद, के पुतले आप नही फूंकेंगे ,तो भगवान प्रसन्न होंगे।
 अगर उन्हीं रुपयों से आप किन्हीं जरूरतमंदों की सहायता करेंगे। किसी परिवार में सच्ची शिक्षा का बीज बोयेंगे किसी को जीवन में आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करेंगे ।
*विजयदशमी का पर्व *मनाईये  अवश्य मनाईये पर  सर्वप्रथम दिलों में परस्पर प्रेम को दीप जलाइए ।
*अपनत्व की फ़सल उगाओ ,वैर ईर्ष्या, निन्दा, हठ, क्रोध आदि राक्षसी वृत्तियों के पुतले हर वर्ष जलायें ।
बंद करें अब ये पुतले फूंकने का खेल आज से प्रत्येक वर्ष "विजयदशमी" पर अमानवीयता ,और अहंकारी रावणों रूपी विचारधाराओं का अंत कर उनके पुतले फुंकिये ।
  

* अमृत और विष*

 *जहर उगलने वाला नहीं, ज़हर पीने वाला हमेशा महान होता   है* 
*  बनना है तो उस कड़वी दवा की तरह बनिये जो शरीर  में होने वाले रोगों रुपी ज़हर को नष्ट करती है ,ना कि उस ज़हर की तरह जो विष बनकर किसी को भी हानि ही पहुंचता रहता है*
* शब्दों का उपयोग बड़े सोच समझ कर करना चाहिये 
 कुछ लोग कहते हैं ,हम तो दिल के साफ हैं ,जो भी कहते हैं ,
 साफ-साफ कह देते हैं ,हम दिल में कुछ नहीं रखते ।
 अच्छी बात है ,आप सब कुछ साफ-साफ बोलते हैं ,दिल में कुछ नहीं रखते ।
दूसरी तरफ आपने ये भी सुना होगा कि ,शब्दों का उपयोग सोच-समझ कर करिये । "मुँह से निकले हुए शब्द "और "कमान से निकले हुए तीर"वापिस नहीं जाते ,कमान से निकला हुआ तीर जहाँ पर जा कर लगता है ,अपना घाव कर जाता है ,अपने निशान छोड़ ही जाता है ,माना कि घाव ठीक हो ही जाता है,परंतु कड़वे शब्दों के घाव जीवन भर दिलों दिमाग पर शूल बनकर चुभते रहते हैं ।
हमारे प्राचीन, ग्रन्थ,इतिहास इस बात के बहुत बड़े उदाहरण हैं,कि देवताओं और दानवों की लड़ाई के समय *समुद्र मंथन हुआ *उस समय समुद्र से *अमृत और *विष दोनों निकले ,कहते हैं समुद्र मंथन से निकला हुआ विष एक जलजले के रूप में था ,अगर उस जलजले को यूं ही छोड़ दिया जाता तो वो सम्पूर्ण विश्व को जहरीला कर देता और युगों-युगों तक उसका असर आने वाली नस्लों को जहरीला करता रहता । सम्पूर्ण विश्व को उस जहरीले विष रूपी जलजले से बचाने के लिये ,*परमात्मा शिव शंकर ने उस विष को अपने कंठ में धारण किया ,और भगवान शिव तब से *नीलकंठ *कहलाये । तातपर्य यह कि, कई बार इस तरह के विष रूपी शब्दों के जहर से अपने कुटुम्ब, व समाज को जहरीला होने से बचाने के लिये कड़वे जहर रूपी विष को पीना पड़ता है ।*जहर उगलने वाला नहीं ,जहर पीना वाला ही हमेशा पूजनीय होता है*
जहाँ बात सत्य की है,सत्य कुछ समय के लिये झूठ के काले घने बादलों के बीच छुप जरूर सकता है ,पर जैसे ही काले घने बादल हटते हैं ,सत्य सामने होता है ,जिस तरह साफ-स्वच्छ निर्मल जल सब कुछ साफ-साफ दिखायी देता है ,चाहे वो कंकड़ हो या हीरा ।

💐फ़लसफ़ा💐

   **💐💐खिले-खिले पुष्पों से ही घर,आँगन महकते है,
   प्रकृति प्रदत्त,पुष्प ,भी किसी वरदान से कम नहीं
   अपने छोटे से जीवन में पूरे शबाब से खिलते हैं💐 पुष्प💐
   और किसी न किसी रूप में काम आ ही जाते हैं
    जीवन हो तो पुष्पों के जैसा, छोटे से सफ़र में बेहद की
    हद तक उपयोगी बन जाते हैं।💐💐

   जीवन का भी यही फ़लसफ़ा है,
  💐 बुझे हुए चिरागों को किनारे कर ,
   जलते हुए चिरागों से ही घर रोशन किये जाते हैं ।
   क्योंकि जो जलता है, वही जगमगाता है ।

 ☺☺  कभी -कभी  यूँ ही मुस्करा लिया करो
   गीत गुनगुना लिया करो ।
  जीवन का संगीत हमेशा
  मधुर हो आवयशक नहीं ।
  हालात कैसे भी हों तान छेड़ दिया करो
  सुर सजा लिया करो,गीत बना लिया करो
  जीवन एक संगीत भी है
  हर हाल में गुनगुना लिया करो ।

 चाँद में दाग है ,सबको पता है
 फिर भी चाँद ही सबका ख्वाब है
 क्योंकि चाँद में चाँदनी बेहिसाब है ।☺☺

* खिलने दो मासूम कलियों को *


*शाम के आठ बजते ही घर में सब शान्त हो जाते थे।
एक दिन न जाने भाई-बहन में किस बात पर बहस छिड़ गयी थी ,बच्चों की माँ चिल्ला रही थी दोनों इतने बड़े हो गये हैं फिर भी छोटी-छोटी बातों पर लड़ते रहते हैं ।

माँ अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही थी कि,बच्चों की बहस खत्म हो ,माँ बच्चों के पास बैठी बोली तुम्हारे पापा, और दादा जी आने वाले हैं ,और तुम्हें पता है, की उन्हें बिल्कुल भी शोर पसन्द नहीं है ,वैसे ही दोनों दिन भर के थके हुए होते हैं ।
बेटी,सान्या दस साल की और बेटा सौरभ पन्द्रह साल का ,लेकिन भाई, बहन की लड़ाई में कौन छोटा कौन बड़ा दोनों अपने को बड़ा समझते हैं ,चलो किसी तरह शांति हुयी ।
माँ बोली आज साढ़े आठ बज गये हैं ,आज तुम्हारे दादा जी और पापा को देर हो गयी है ,अब तुम दोनों शांति से बैठे रहना ,वरना सारा गुस्सा तुम दोनों पर ही निकलेगा ।

इतने मे डोर बेल बजी ,दादा जी ,और पापाजी हाथ-मुँह धो कहना खाने बैठ गये ,माँ  एक सेकंड भी देर नहीं करती थी दोनों को खाना परोसने में,क्योंकि माँ वो दिन कभी नहीं भूलती थी ,जब एक दिन खाना देर से परोसने पर माँ को दादा जी से बहुत फटकार पड़ी थी ,और दादा जी ने उस दिन खाना भी नहीं खाया था ,और माँ को बहुत बड़ा लेक्चर दिया था ,कि बहू समय की क़ीमत समझो ,अपने बच्चों को कल क्या सिखाओगी ,वगैरा-वगैरा .....

रात को भोजन हो गया था,दादा जी, और पापा जी रोज की तरह आज भी दिन-भर क्या कमाया ,किसका कितना लेन-देन है बात-चीत करने लगे । इधर बच्चे अपना-अपना स्कूल का बैग लेकर बैठ गये और पढ़ने लगे ,पर बच्चे तो बच्चे ठहरे ,थोड़ा पढ़ना ,ज्यादा मस्ती ,ना जाने किस बात पर दोनों भाई -बहन हँसने लगे ,पापा ने आवाज लगायी ,पढ़ाई में मन लगाओ ,बच्चे चुप होकर पढ़ने लगे ।
आधा घंटा बीत गया था ,भाई बोला मेरा काम हो गया ,बहन बोली मेरा भी होने वाला है ,वो जल्दी -जल्दी लिखने लगी ।
भाई खाली बैठा था,खाली दिमाग शैतान का दिमाग ....

दोनों भाई बहन के स्कूल का काम पूरा हुआ ही था कि, भाई को जाने क्या सूझी ,बहन को पेंसिल चुभा दी,फिर तो दोनों भाई-बहन में झगड़ा शुरू हो गया, माँ ने बहुत समझाया की वो चुप हो जायें लेकिन दोनों ही बराबर बोले जा रहे थे,इसने ये किया ,उसने वो किया जब बहुत देर तक भाई-बहन की लड़ाई खत्म ना हुई तो उधर से पापा ने आवाज लगायी ,पापा की आवाज सुनते ही दोनों चुप हो गये।थोड़ी देर शान्ति से बैठने के बाद फिर जाने क्या बात हुयी ,दोनों भाई बहन हँसने लगे ,और हंसी भी ऐसी की रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी ,पापा-मम्मी दोनों ने उन्हें शान्ति से रहने को कहा दोनों भाई-बहन थोड़ा चुप होते फिर शुरू हो जाते ,ये सिलसिला बढ़ता ही जा रहा था । दिन-भर के काम के बाद दादा जीऔर पापा जी पहले ही इतना थक जाते थे कि घर पर आकर उनका सिर्फ चुप-चाप काम करके आराम करने का मन करता ।
बच्चों की हँसी और शरारतों की आवाजें मानों पापा को परेशान कर रही थीं, पापा जी उठे और बच्चों के पास जाकर जोर-जोर से डाँटने लगे ,बच्चे डर गये ,सहम गये ,बेटी के तो आंखों से आँसू ही बहने लगे ,भाई-बहन आपस मे चाहे जितना लड़ लें ,पर दोनों में से कोई भी एक दूसरे के आँसू नहीं देख सकता ।
भाई  बहन के आँसू देखकर बोला पापा ,आप को तो हँसना आता नहीं ,औरों को भी हँसने नहीं देते बिना बात पर छुटकी को रुला दिया ,इतने मे माँ ने बेटे को जोर की डाँट लगायी ,पापा से ऐसे बात करते हैं ,चलो माफ़ी माँगो अपने पिताजी से ......
अगला दिन सुबह के आठ बजे थे,बच्चे स्कूल के लिये तैयार होकर ,स्कूल चले गये ,आज बच्चों ने पापा-मम्मी से कोई फ़रमाइश नहीं की।
पापा जी बच्चों की माँ से बोलने लगे ,देखा जब तक बच्चों को डांटे ना तब तक अक्ल नहीं आती आज देखा कितने अच्छे लग रहे थे ।
आज स्कूल से आने के बाद भी बच्चे ज्यादा बोले नहीं थे चुप ही रहे माँ खुश थी कि बच्चे सुधर गये ।
रोज की तरह रात के आठ बजे दादा जी और पापा घर आ गये थे ,आज बड़ी शांति से दादा जी और पापा ने खाना खा कर काम किया ,बच्चे भी टाइम से सो गये थे।
अब तो हर रोज यही सिलसिला ,एक और तो दादाजी और पापा खुश थे कि उनके बच्चे शांत स्वभाव के हो गये हैं, परन्तु अब दादाजी ,और पापा को एक कमी अखरने लगी ,लगा जैसे घर में खिलौने तो हैं ,पर इनसे खेलने वाला कोई नहीं है ,नन्हें पंछी तो हैं ,पर वो उड़ नहीं सकते चहक नहीं सकते ,पापा को अपनी गलती महसूस हुयी ,उन्हें लगा यही तो बच्चों के खेलने -कूदने और शरारते करने के दिन है ,बड़े होकर तो यह हमारे जैसे हो जायेंगे ,जी लेने दें इन्हें इनकी जिन्दगी।
आज तो मानो चमत्कार हुआ पापा जी अपने बाच्चों के पास जाकर बैठ गये, ये क्या आज तो पापाजी बच्चों जैसी हरकतें करने लगे, पापा जी ने अपने बच्चों के साथ बहुत मस्ती मारी ,चुटकले सुना सुना कर बच्चे हँसी के मारे लोट-पोट हो रहे थे ,
पापाजी भी हँस रहे थे ,बैटे ने पूरे परिवार के साथ पापा जी ,माँ दादाजी सबकी हँसती हुई एक सेल्फी ली ।
फिर पापा को वो फोटो दिखाते हुए बोला पापा जी आप हंसते हुए बहुत अच्छे लगते हैं, और आपको तो हंसना आता है फिर आप हँसने में कंजूसी क्यों दिखाते हो , पापा हमारे स्कूल की एक किताब में भी एक पाठ है ,जिसमे हँसने के फायदे लिखें है ।
"पापा हँसने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, और नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है ।"
"हँसना स्वास्थ्य के लिये बहुत लाभदायक है ।"



"पापा जी बोले हाँ बेटा मैं जानता हूँ पर कभी किसी की मजबूरी पर किसी के दुख पर मत हँसना ....."

"बच्चे बोले पापा हम आपके बच्चे हैं ,आपसे हमे ऐसे संस्कार मिलें हैं कि हम कभी किसी का मज़ाक नहीं उड़ाएंगे और ना ही बुरा करेंगे ।।"


👍आत्मविश्वास👍

*आत्मविश्वास *

     " आत्म विश्वास यानि स्वयं का स्वयं पर विश्वास
       अद्वित्य,अदृश्य, आत्मा की आवाज़ है ,आत्मविश्वास"

       आत्मविश्वास मनुष्य में समाहित अमूल्य रत्न मणि है।
       आत्मविश्वास एक ऐसी पूंजी है
       जो मनुष्य की सबसे बड़ी धरोहर है।

      आत्म विश्वास ही चींटी को पहाड़ चढ़ने को प्रेरित करता          है ,वरना कहाँ चींटी कहाँ पहाड़।
      आत्मविश्वास विहीन मनुष्य मृतक के सामान है ।

       तन की तंदरुस्ती माना की पौष्टिक भोजन से आती है 
       परन्तु मनुष्य के आत्मबल को बढ़ाता है 
       उसका स्वयं का आत्मविश्वास ।

       आत्म विश्वास ही तो है जिसके बल पर बड़ी-बड़ी जंगे             जीती जाती हैं ,इतिहास रचे जाते हैं ।
     
       आत्मविश्वास, यानि, स्वयं की आत्मा पर विश्वास
       स्वयं का स्वयम पर विश्वास जरूरी है ,वरना हाथों
       की लकीरें भी अधूरी हैं।
       कहते हैं हाथों की लकीरों में तकदीरें लिखी होती है 
       बशर्ते तकदीरें भी कर्मों पर टिकी होती हैं ।

       आत्म विश्वास यानि स्वयं में समाहित ऊर्जा को                    पहचानना और उसे उजागार करना ।
       तन की दुर्बलता तो दूर हो सकती है 
       परन्तु मन की दुर्बलता मनुष्य को जीते जी मार 
       देती है ।
       इसलिए कभी भी आत्म विश्वास ना खोना 
       मेरे साथियों ,क्योंकि आत्मविश्वास ही तुम्हारी 
       वास्तविक पूँजी है , जो हर क्षण तुम्हें प्रेरित करती है।
        निराशा से आशा की और ले जाती है । 
             

**मेरी नियति**

  **  ना जाने मेरी नियति
        मुझसे क्या -क्या करवाना
            चाहती है ।

       मैं संतुष्ट होती हूँ
       तो होने नहीं देती
       बेकरारी पैदा करती है ,
       जाने मुझसे कौन सा अद्भुत
       काम करवाना चाहती है ।

       मैं जानती हूँ ,मैं इस लायक नहीं हूँ
       फिर भी मेरी आत्मा की बेकरारी ,
       मुझे चैन से बैठने ही नहीं देती।
       समुन्दर में लहरों की तरह छलांगे
                  लगती रहती है।

      मुझमें इतनी औक़ात कहाँ की मैं
       कुछ अद्वितीय कर पाऊँ ,
          इतिहास रच पाऊँ
       पर मेरी नियति मुझसे कुछ
       तो बेहतर कराना चाहती है।

       तभी तो शान्त समुन्दर में
       विचारों का आना -जाना लगा रहता है ।
       और मेरे विचार स्वार्थ से ऊपर उठकर
        सर्वजनहिताय के लिये कुछ करने को
            सदा आतुर रहते हैं ।

        बस मेरी तो इतनी सी प्रार्थना है परमात्मा से
          की वो निरन्तर मेरा सहयोगी रहे ।
                 मेरा मार्गदर्शन करता रहे ।
       विचारों के तूफानों को सही दिशा देकर
      शब्दों के माध्यम से कागज़ पर उकेरते रहती हूँ।
               
   


"अनमोल नगीने "


        *हम सदियों से ऐसा ही जीवन जीते आये हैं ,हमें आदत है ,हमारा जीवन यूँ ही कट जाता है ।

 ये सवाल सुनने को मिला जब मैं बस्ती में गयी, जब हमारे घर काम करने वाली बाई कई दिनों तक काम  पर नहीं आयी थी ।
किसी दूसरे घर में काम करने वाली ने बताया कि वो बहुत बीमार है उसे बुखार आ रहे हैं ,और उसे पीलिया की शिकायत भी है ।

जब मैं अपनी बाई की झोपड़ी में पहुँची ,तो वो शरीर मे जान न होने पर भी यकायक उठ के बैठ गयी ।
वह बहुत कमजोर हो चुकी थी ,उसे देख मेरा हृदय द्रवित हो उठा ,मैंने उसे लेट जाने को कहा उसका शरीर बुखार से तप रहा था ,इतने मे कोई कुर्सी ले आया मेरे बैठने के लिये ।
मैंने उससे पूछा तुम्हारे घर में और कौन-कौन है ,बोली मेरे दो बच्चे हैं ,एक लड़का और एक लड़की।

लड़का पन्द्रह साल का है काम पर जाता है , उसे पढ़ने का भी बहुत शौंक है अभी दसवीं का पेपर दिया है ,पर क्या करेगा पढ़ कर ,हम ज्यादा खर्चा तो कर नहीं सकते ,  लड़की भी काम पर जाती है, मैंने पूछा लड़की कितने साल की है ,बोली दस साल की ।
मैं स्तब्ध थी ,दस साल की लड़की और काम ,कहने लगी हम लोगों के यहाँ ऐसा ही होता है, घर में बैठकर क्या करेंगें बच्चे ,बेकार में इधर-उधर भटकेंगे ,इससे अच्छा कुछ काम करेंगें ,दो पैसे कमाएंगे तो दो पैसे जोड़ पाएंगे, दो-चार साल में बच्चों की  शादी  भी करनी होगी ।

मैंने कहा ,और पढ़ाई ..... बोली पढ़ाई करके क्या करेंगें ,कौन सा इन्हें कोई सरकारी नौकरी मिलने वाली है ।
मेरे घर काम करने वाली बाई बोली, और दीदी हम सदियों से ऐसा ही जीवन जीते आये हैं ,हमारे नसीब में यही सब है ।
मैं उसकी बातें सुनकर सोचने लगी शायद यह अपनी जगह सही ही कह रही है, जितना इन्सान आगे बढ़ता है उतने ख़र्चे भी बढ़ते हैं ,शायद इतना आसान नहीं होता जितना बड़ा घर होगा उतना ही जरूरत्त का सामान भी बढ़ेगा ,शायद कहना आसान होता है ,पर जिस पर बीतती है उसे ही पता होता है ।
 मैंने अपनी काम वाली बाई को कुछ रुपए दिये ,और उसे अपना ख्याल रखने को कहा ।

इतने में उसका पन्द्रह साल का बेटा आया ,वो मेरे लिये चाय बना कर लाया था साथ में मिठाई भी लाया था ,मैंने कहा नहीं-नहीं मैं चाय नहीं पीती ,इतने में वो बोला आँटी मिठाई तो आपको खानी पढ़ेगी, पता है क्यों ?
इससे पहले मैं बोलती उसकी माँ बोली ऐसा कौन सा किला फतह किया है तूने जो मिठाई खिला रहा है,बेटा बोला माँ पहले मिठाई खाओ फिर बताऊंगा, हम दोनों ने जरा-जरा सी मिठाई खायी ,फिर बोला माँ ,आँटी जी , मैं दसवीं के एग्जाम में पास हो गया हूँ ,अब मैं और पडूंगा,और कम्प्यूटर कोर्स करूँगा ,माँ अब तुम्हें काम करने की जरूरत्त नहीं पढ़ेगी ,माँ अब हम अच्छे घर मे रहेंगे
अब हमें गरीबी का जीवन नही जीना पढ़ेगा ,अब हमारे दिन भी बदलेंगें , माँ की आँखों से अश्रु धारा बह रही थी ,लड़के ने मेरे पैर छूते हुए कहा आँटी जी आपका आना हमारे लिये बहुत शुभ हो गया ,आप आशीर्वाद दीजिये की मेरी बहन भी पढाई करे और अपने जीवन मे सफ़ल हो ।

सच मे आज दिल बहुत खुश था , की मेरी काम वाली बाई के बच्चों ने पढ़ाई के महत्व को समझ कर जीवन मे आगे बढ़ने का निर्णय लिया है ,मैंने भी उसके बेटे को आशीर्वाद देते हुए कहा ,हाँ बेटा ,जीवन मे आगे बढ़ो खूब पड़ो लिखो आगे पड़ो, और अपनी माँ पिताजी की ऐसी सोच को बदल डालो कि ,हमे तो सदियों से गरीबी का जीवन जीने का वरदान मिला है ।
बेटा खुश था, माँ के चेहरे पर खुशी थी ,पर आँखों से प्रेम की अश्रु धारा बह रही थी वह कुछ कह नहीं पा रही थी, पर उसके अश्रुओं ने बहुत कुछ के दिया था।
इतने मे काम वाली बाई का बेटा बोला आँटी जी आप देखना मैं पड़ लिखकर बहुत बड़ा इन्सान बनूँगा और अपनी बहन को भी पढ़ाऊंगा ,क्यों हम हमेशा गरीबी का जीवन जीयें ,हमारा भी हक़ है अमीर बनने का आगे बढ़ने का , उसके बेटे की बातों में आत्मविश्वास था ,आज दिल बहुत खुश था कि,हमारे समाज में आज भी अनमोल नगीने हैं।
सच में इंसान की मेहनत और आत्मविश्वास ही उसे जीवन मे आगे बढ़ने में सहायता करते हैं ।



"खुला आसमान"

**उपयोगिता और योग्यता**

          *योग्यता ही तो है ,जो
           अदृश्य में ,छुपी उपयोगिता को
           जन्म देती है।*

          * वास्तव में जो उपयोगी है वो शाश्वत है
           उपयोगी  को योग्यता ही तराशती है ।
          जो उपयोगी है, वो सवांरता है, निखरता है
          और समय आने पर अपना अस्तित्व दिखाता है
          योग्यता ही अविष्कारों की दात्री है।

           आवयशकता जब-जब स्वयं को तराशती है
           असम्भव को सम्भव कर देती है
           युगों-युगों तक अपने छाप छोड़ने में सफल होती है
   
       
           गहराइयों का शोध आवयशक है
           वायुमंडल में तरंगे शास्वत हैं।
           उन तरंगों पर शोध, योग्यता से सम्भव हुआ
           योग्यता ने तरंगों के माध्यम से
           वायुमंडल में एक खुला जहाँ बसा दिया ।

         
           वायु,ध्वनि,तरंगों का अद्भुत संयोग
          योग्यता ने तरंगों की रहस्यमयी शक्तियों का भेद बता             दिया ।
          तरंगों के अद्भुत सामंजस्य ने तरंगों से तरंगों  का मेल                 मिला दिया
          आधुनिक समाज की नींव ही तरंगों पर टिकी है
          शब्द हैं भी ,और नहीं भी ,
         तरंगों की नयी दुनियाँ ने सम्पूर्ण समाज मे हलचल सी            मचा दी
         है । तरंगों की तरंगों तक पहुँच ने नामुमकिन को                  मुमकिन  कर दिखाया  है।
                                                                               
        वास्तव में तरंगों ने खुले आसमान में एक दूसरा जहाँ              बसा दिया है।

          

"अनमोल खजाना "


दौड़ रहा था ,मैं दौड़ रहा था
बहुत तेज रफ़्तार थी मेरी ,
आगे सबसे सबसे आगे बहुत आगे
बढ़ने की चाह मे मेरे क़दम थमने का
नाम ही नहीं ले रहे थे ।
यूँ तो बहुत आगे निकल आया था "मैं "
आधुनिकता के सारे साधन थे पास मेरे
दुनियाँ की चकाचौंध में मस्त,व्यस्त ।

आधुनिकता के सभी साधनों से परिपूर्ण
मैं प्रस्सन था ,पर सन्तुष्ट नहीं
जाने मुझे कौन सी कमी अखरती थी ।

एक दिन एक फकीर मुझे मिला
वो फ़कीर फिर भी सन्तुष्ट ,मैं अमीर
फिर भी असन्तुष्ट ।

फ़कीर ने मुझे एक बीज दिया,
मैंने उस बीज की पौध लगायी
दिन -रात पौध को सींचने लगा
अब तो बेल फैल गयी ।
अध्यात्म रूपी अनमोल ,रत्नों की मुझे प्राप्ति हुई
मुझे संतुष्टता का अनमोल खजाना मिला
ये अध्यात्म का बीज ऐसा पनपा कि
संसार की सारी आधुनिकता फीकी पड़ गयी
मैं मालामाल हो गया ,अब और कोई धन मुझे रास
नही आया ,अध्यात्म के रस में जब से मैंने परमानन्द पाया।
वास्तव में अध्यात्म से सन्तुष्टता का अनमोल खज़ाना मैंने  पाया

**धरती और आकाश **

***आकाश ,और धरती का रिश्ता तो देखो
कितना प्यारा है ।
ज्येष्ठ में जब धरती तप रही थी
कराह रही थी ,सिसक रही थी
तब धरती माँ के अश्रु रूपी जल कण आकाश में एकत्रित हो रहे थे।।

💐💐वर्षा ऋतु मैं..........
आकाश से बरस रहा था पानी
लोग कहने लगे वर्षा हो रही है
पर न जाने मुझे क्यों लगा
आकाश धरती को तपता देख रो रहा है
अपने शीतल जल रूपी अश्रुओं से
धरती माँ का आँचल धो-धोकर भीगो रहा है
धरती माँ को शीतलता प्रदान कर रहा है।
धरती माँ भी प्रफुल्लित हो ,हरित श्रृंगार कर रही है
वृक्षों को जड़ें सिंचित हो रही हैं।
प्रसन्नता से प्रकृति हरियाली की चुनरिया ओढे
लहलहा रही हैं ।
फल फूलों से लदे वृक्षों की लतायें
रिम-झिम वर्षा के संग झूल रही हैं
विभिन्न  आकृतियों वाले मेघ भी
धरती पर अपना स्नेह लुटा रहे हैं।
धरती और आकाश का स्नेह बहुत ही रोमांचित कर देने वाला है ।

*मीठा ज़हर **


जख्मों पर मरहम लगाते-लगाते
कब हम सयाने हो गये पता ही नहीं चला ।

अब ना ज़ख्म है
 ना जख्मों के दर्द का एहसास है ।
किसी जमाने मे जो ज़ख्म दर्द बनकर चुभते थे
आज उन्हीं जख्मों का एहसास,जीवन में घोल देता है
एक मीठा सा ज़हर।


दर्द तो बहुत दिया जख्मों ने मगर
कयोंकि? बहुत लम्बे सफ़र तक रहे थे,ज़ख्म मेरे हमसफ़र
कैसे भूल जाऊँ मैं उन मीठे जख्मों की कसक।
माना कि जख्म आये थे जीवन मे बन के कहर ।
जीवन की कसौटी थी मग़र ,
पर इन्हीं से बुलन्द हुआ था, मेरे हौसलों का सफ़र
सीखे थे ,इन्हीं से जिन्दगी के कई सबक ।
 आज कोई जख्म  नहीं
 दर्द भी नहीं ।पर ना जाने क्यूँ
कुरेदता है ये दिल पुराने जख्मों
के निशान
तजुर्बा कहता है जब लम्बे समय तक रहे जो कोई
हमसफ़र , फिर चाहे वो
दर्द ही सही ,अपने से हो जाते हैं  ,मीठे से लगने लगते हैं ,
मीठे जख्मों के ज़हर ।।
माना कि दुखदायी था ,
फिर भीआज मीठा सा लगता है
मीठे जख्मों का जहर,








**हरियाली तीज **


घर की बड़ी औरतें ,अपनी बहू ,बेटियों से कह रही थीं जल्दी करो कल 💐हरियाली तीज💐 है ।

 बाजार से श्रृंगार का सामान भी लाना है ,और नाश्ते का सामान घेवर ,सभी तो तैयार करना है ,और तुम सब तो अपने
ही कामों में व्यस्त हो ,चलो-चलो जल्दी करो ।
फिर घर आकर झूला भी तैयार करना है ।
घर की सभी औरतें तैयार होकर बाज़ार समान लेने चली गयी।

इधर घर पर बूढ़ी दादी ,और उनकी पाँच साल की पौती घर पर थे ,दादी पौती लाड़ लड़ा रहे थे ,दादी अपनी पौती से बोली कल तो मेरी गुड़िया चूड़ियां पहनेगी,मेहन्दी लगायेगी और अच्छे-अच्छे कपड़े पहनेगी ।  पौती बोली हाँजी दादी मैं झूला भी तो झूलूंगी ,दादी मुस्करा के बोली हाँ बेटा ,दादी आप भी मेरे साथ झूला झूलना मैं आपको पकड़ कर रखूंगी ,गिरने भी नहीं दूँगी ।
दादी मुस्करा कर बोली हाँ ,मेरी दादी तो गुड़िया है ।
  पौती ने दादी से पूछा कल आप कौन से रंग की साड़ी पहनोगे ,दादी बोली मैं तो हरे रंग की साड़ी पहनूँगी तुम भी हरे रंग का लहंगा पहनना ,मैंने तुम्हारी माँ से तुम्हारे लिये हरे रंग का लहंगा लाने को कहा है ।
पौती बोली पर दादी मुझे तो लाल और पीला रंग अच्छा लगता है ।
दादी बोली हाँ बेटा रंग तो सब अच्छे होते हैं ,पर कल *हरियाली तीज*है इस लिये हम सब भी हरे रंग के कपड़े पहनेगें ।
सावन का महीना है ,रिमझिम-रिमझिम बरसात से धरती देखो कितनी स्वच्छ और आकर्षक लग रही है।
चारो और देखो धरती माँ ने हरा -भरा श्रृंगार किया है ,कितनी फल-फूल रही है धरती चारों और सुख-समृद्धि और हरियाली ही हरियाली ,कितनी सुन्दर लग रही है ना धरती माँ ।
पौती बोली हाँ जी दादी चारों और हरियाली है ।
चलो अब हमें झूला भी झूलना है ,दादी हाँ चल थोड़ी देर झूला झूल ले फिर मेहन्दी भी लगानी है ,पौती खुश होकर बोली दादी मैं तो बहुत सुंदर फ्लावर बनवाऊंगी अपने हाथ में ।
इतने में दरवाजे की घंटी बजी ,घर की सभी औरतें बाज़ार से खरीददारी करके आ गयी थीं ,चूड़ियां कंगन,बिछुए, कपड़े ,मिठाइयां सभी ले आये थे ।
दादी और पौती सबसे पहले मेहन्दी लगाने बैठ गयीं थीं ,क्योंकि उन्हें सबसे ज्यादा जल्दी सज-धज कर झूला झूलने की थी .....
हरियाली तीज  का मौका था ,सबके हाथों में मेहन्दी लग रही थी ,दादी और पौती अपनी -अपनी मेहन्दी सूखने के इंतजार कर रही थीं ,खिड़की पर खड़ी दादी ने अपनी पौती को बाहर बुलाते हुए कहा......देखो गुड़िया आसमान से कैसे रिम-झिम बरखा की बूंदे गिर रही है वो देखो ऐसा लग रहा है,जैसे आसमान से मोती गिर के धरती का श्रृंगार कर रहें हों ,हरियाली की चुनरिया ओढे धरती कितनी सुशोभित हो रही है
तभी हवा का मीठा सा ठंडा सा झोंका  वृक्षों की लताओं को झूला झुला कर आने  जाने लगा  , सच में सावन के मौसम में आसमान से और धरती का रिश्ता बहुत गहरा हो जाता है ।
प्रकृति और हमारे तीज त्योहारों का एक दूसरे के साथ बहुत गहरा सम्बन्द्ध है ।

**रंगों का सामंजस्य**


    एक ख्याति प्राप्त खूबसूरत, चित्र
    जिसे देख सब मंत्रमुग्ध हो
    उसे निहार रहे थे।
    चित्र और चित्रकार की चित्रकारी
    के कसीदे पड़े जा रहे थे।
   
     चक्षुओं का क्या कहना
     नजरें गड़ाये मानों सुंदरता
     अपने में समा लेना चाहते थे
     मानों दुबारा इतनी सुंदरता देखने
      को मिले न मिले
    जिसे देख वाह!वाह!
    स्वतः ही निकल जाता हो।
 
    आप जानना नहीं चाहेंगे
     उस चित्र का चित्रकार कौन है
     उस चित्र के पीछे का सच।
   
     कोई भी चित्र यूँ ही खूबसूरत नहीं
      बन जाता है।
      कभी वो भी खाली कैनवास ,यूँ।
      बेतरबीब पड़े रंग ,कहीं रंग ,कहीं
      केनवास ,सब नीरस, अस्त, व्यस्त
     
      कभी कहीं किसी के नीरस मन में
      में उपजा एक खूबसूरत ख्याल ।
      उस ख्याल ने लगाये विचारों के पंख
      बहुत फडफ़ड़ाएं उसके पंख
      कभी इस दिशा कभी उस दिशा
       जीवन मे खूबसूरती की चाह थी
        रंगों में सामंजस्य बनाना था
         कई बार बिखरे ,मिटे ,आखिर
          कड़ी मेहनत के बाद एक खूबसूरत
           तस्वीर तैयार हुयी जो समाज के लिये
            मिसाल बन गयी
             तारीफ चित्रकारी की हुई ,चित्रकार को
               गर्वान्वित महसूस हुआ।
           
   

   



****आओ जीवन के किरदार में सुन्दर रंग भरे***                  💐                                    ************************************
 ** तन के पिंजरे में**
**  शिवशक्ति परमात्मा की
**  दिव्य जोत ***
  आत्मा से ही जीवन का अस्तित्व
  आत्मा बिन शरीर बन जाता है शव।।
  फिर क्यों न आत्मा को ही शक्तिशाली बनायें
  आत्मा को पमात्मा में स्थिर करके जीवन को
  सफ़ल बनाएं ।

  
**जीवन का सत्य ,
एक अनसुलझी पहेली
जीवन सत्य है
पर सत्य भी नहीं
पर जीवन क्या है
एक अनसुलझी पहेली ।।

**जीवन एक सराय
हम मुसाफ़िर माना कि सत्य है
सफ़र....बहुत लम्बा सफ़र ।।
सफ़र का आनन्द लो
खूबसूरत यादों को जीवन के
कैमरे में कैद कर लो अच्छी बात है ,
बस यही  साथ  जाना है ।
अच्छी यादें, माना कर्मों की खेती
जैसा बीज ,वैसी खेती ।

जीवन के रंगमंच पर भवनाओं का सैलाब
कर्मो का मायाजाल, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ
जैसी भावनायें ,भवनाओं में उलझ जाना स्वभाविक
माना कि, सत्य,असत्य,के विवेक का भी बोध है।

कहता है शोध, जीवन है.....
आत्मा की शुद्धि का संयोग
आत्मा की शुद्धि स्वयं में हठयोग
कीचड़ में कमल की तरह खिलते रहना
कीचड़ में रहकर स्वयं को कीचड़
से बचाना ।
आधुनिकता का आकर्षण ,आकर्षण में रहना
परन्तु स्वयं को आकर्षण से बचाना,
बड़ी ही बेदर्द है, समाज की परम्पराएं.....

प्रकृति से मैंने देने का गुण सीखा,
देने वाला सदा, प्रसन्न और तृप्त रहता है ।
जहाँ कहीं भी निस्वार्थ सेवा होती है
मैंने उनके खजाने स्वयमेव भरते देखे है।
वृक्षों की भाँति अपनी शरण मे आये को
फल,फूल, शीतल वायु ,देते रहो...
दरिया की भाँति निरन्तर आगे बढ़ना

जीवन के सफ़र में संग तो कुछ जाना नहीं
तो क्यों ना कुछ ऐसा कर चलें कि
हमारे जाने के बाद भी हमारे कर्मों की
खुशबू हवाओं में रहे ,कुछ ऎसे चिन्ह छोड़ते चलते
हैं ,की दुनियां हमारे चिन्हों का अनुसरण करें ।
जीवन एक सराय ,हम मुसाफ़िर
जीवन को भरपूर जियो पर अच्छे और बुरे  विवेक के संग ।।।
आओ अपने किरदार में सुन्दर रंग भरे ।
स्वयं की लिये तो सभी जीते हैं ,
हम किसी और के जीने की वजह बन जाएं
किसी के काम आ जाएं ,स्वयं के जीवन को
दूसरों के लिए प्रेरणापुंज बनाएं ।










***आखिर कब तक**

आखिर कब तक **

बहुत हो गया चूहे बिल्ली का खेल

ये तो वही आलम है ,घर मे शेर ,बाहर गीदड़

बड़ी-बड़ी बातें करनी तो सभी को आती है

पकड़ो -पकड़ो चिल्लाने से कुछ नही होगा

हत्यारे तुम्हारे ही घरों में घुसकर तुम्हें मार रहे है ।


वाह! वाह! मरते रहो ,मरणोपरांत तुम्हे सम्मान मिलेगा

बड़े-बड़े नेता तुम्हारी मृत्यु पर राष्ट्रीय शोक मनायेंगे

बड़ी-बड़ी योजनाएं बनेगी ,आतंकवादी यों को जड़ से मिटाने की

तुम्हारे नाम पर तुम्हारे परिवार वालों को सहायता राशी भी मिलेगी।


बस-बस-बस बस करो क्यों अपने ही देश की जड़ों को खोखला कर रहे हो ।

अब बातें करने का समय बीत गया है ,कहते भी हैं जो *लातों के भूत
होते है वो बातों से नही मानते *

तुम्हारी सादगी को तुम्हारी शराफ़त को तुम्हारी कमजोरी समझ
आँकवादी तुम पर वार-वार कर रहे है ।

आखिर कब तक कितने माँ के लाल शहीद होंगे ,

घर के भेदी अब ना बचने पायें।

उठाओ बंदूके निशाना साधो ,एक एक आतंकवादी का
अब करना है सफाया ।

☺शिक्षा और सभ्यता ☺


☺**शिक्षा, सभ्यता ,और आधुनिकता,
शिक्षा है, तो सभ्यता आयी ,सभ्यता आयी तो आधुनिकता बड़ी।।*
☺आज की युवा पीढ़ी शिक्षित हुयी
शिक्षा के संग सभ्यता आना स्वभाविक है
उत्तम संजोग है ,सभ्यता ,तरक्की,और उन्न्ति की ऊँचाइयाँ छूना ।👍
क्या सभ्यता ,सिर्फ अत्यधिक धनोपार्जन और ब्रेंडड
वस्त्रों तक सीमित है ।
आधुनिकता की दौड़ में सब दौड़ रहे है
 लाभ के लोभ में ,संस्कारों की हानि का कोई 
खेद नहीं।।

💐सभ्यता के सही मायने ही नहीं ज्ञात 
अत्यधिक धनोपार्जन करना ही ,मात्र 
तरक्की का सूचक नहीं ।☺
वातानुकूलित कक्ष में बैठकर कोट,पेन्ट,टाई पहनकर 
रौब दार रवैया अपनाने को ही ,
आधुनिकता ,और सभ्यता की पहचान माना जाने लगा है
हाँ सत्य है सुविधाएं बढ़ना प्रग्रति का सूचक है ।
परन्तु सुविधाओं की आड़ में आधुनिकता
के प्रदर्शन में अपनी संस्कृति को भूल जाना
छोटों को प्यार,स्नेह,बड़ों का आदर करना भूल जाना
ऐसी सभ्यता किस काम की ।
सभ्यता यानि ,आचरण की सभ्यता ,
विचारों की विनम्रता ,शिक्षा और सभ्यता एक दूसरे के पूरक हैं ,सच्ची शिक्षा तभी सार्थक है ,जब वह सभ्य आचरण के साथ फलती फूलती है ।।
******************************************

*****स्वयं का नेतृत्व ****

 💐💐   कौन किस के हक की बात करता है
    अपने कर्मों की खेती स्वयं ही करनी पड़ती है
    स्वयं ही स्वयं को प्रोत्साहित करना पड़ता है
    काफिले में सर्वप्रथम तुम्हें अकेले ही चलना       पड़ेगा
     जीत तो उसी की होती है ,जो स्वयं ही स्वयं का
     नेतृत्व करता है।💐💐

** मैंने उस वक्त चलना शुरू किया था
     जब सब दरवाजे बंद थे ,
     पर मैं हार मानने वालों में से कहाँ था
     कई आये चले गए ,सब दरवाजे बंद है
     कहकर मुझे भी लौट जाने की सलाह दी गयी ।पर ,

     मैं था जिद्दी ,सोचा यहां से वापिस नहीं लौटूंगा
     टकटकी लगाये दिन-रात दरवाजा खुलने के इन्तजार
    मैं पलके झपकाए बिना बैठा रहता ,
    बहुतों से सुना था,यह दरवाजा सालों से नही खुला है ,
    पर मेरी जिद्द भी बहुत जिद्दी थी ।

   एक दिन जोरों की तूफ़ान आने लगा ,आँधियाँ चलने लगी
    मेरी उम्मीद ए जिद्द थोड़ी-थोड़ी कमजोर पड़ने लगी
   पर टूटी नहीं ,नजर तो दरवाजे पर थी
   तीर कमान में तैयार था , अचानक तेज हवा का झौंका   आया मेरे चक्षुओं में कोई कंकड़ चला गया ,
   इधर आँख में कंकड़ था , उधर आँधी से जरा सा
 दरवाजा खुला ।
😢
   आँख कंकड़ से जख्मी थी ,पर मैंने निशाना साधा मेरा तीर
   दरवाज़ा खुलते ही लग गया ,जीत मेरी जिद्द की थी  या मेरे विश्वास की जीत हुई मेरे संयम की ।

  इरादे अगर मजबूत हों और स्वयं पर विश्वास हो और आपके
  कर्म नेक हों तो दुनियाँ की कोई ताकत आपको जीतने से रोक नहीं सकती ।
कोई भी रास्ता आसान नही होता ,
उसे आसान बनाना पड़ता है ,अपने
नेक इरादों सच्ची मेहनत लगन , निष्ठा और संयम से ।

**आभार ब्लॉग जगत **

**आभार ब्लॉग जगत **

**मकसद था कुछ करूं,
मेरी दहलीज जहां तक थी वहीं तक जाना था 
,करना था कुछ ऐसा जो उपयोगी हो कल्याण कारी हो ,
जिसकी छाप मेरे दुनियाँ से चले जाने के बाद भी रहे ,
बाल्यकाल में महान लेखकों की लेखनी ने प्रभवित  किया 
देश की आज़ादी के किस्से वीर शहीदों के किस्से आत्मा को झकजोर देते।
दायरा जहां तक सीमित था 
लिखकर अपनी बात कहनी शुरू की , यूँ तो किसी का लिखना कौन पड़ता है ,पर फिर भी लिखना शुरू किया ।
धन्यवाद ब्लॉग जगत का ।
आज लिखने को खुली ज़मीन है ।
आसमान की ऊँचाइयाँ है , क्या सौभाग्य है 
परमात्मा ने स्वयं हम लेखकों की सुनी शायद ।
आज ब्लाग जगत के माध्यम से लेखक भी सम्मानित होने लगे ।
** क्या छिपा रहे हो ****   {कविता }

   * क्या छिपा रहे हो
   * कितना छिपाओगे
    *लाख छुपाओगे उजाले को
     💐उजाला किसी झिर्री से बाहर आ ही जायेगा
    💐💐💐💐💐💐
    *जो सच है ,सामने आ ही जाता है
** श्वेत मेघों की ओट में
   वो छुपा बैठा था सच
   बना-बना कर विभिन्न
   आकृतियाँ मोहित कर
   रहा था सभी को ।

  💐 आसमान की ऊँचाइयाँ
   पर जा -जाकर इतरा रहा था।
   उसी में सच्चाई दिखा
   दिल लुभा रहा था   ।

  💐 सुना था सच सामने आ ही जाता है
   अचानक तेज आँधियाँ चली
   सब अस्त-व्यस्त ।
   श्वेत मेघों का पर्दा हटा
   हो गया सब पानी-पानी ।
 
  शाश्वत था जो वो सामने आ गया
  लाख छुपा सत्य विभिन्न आकृतियों
  वाले श्वेत ,काले ,घने ,मेघों की ओट में ।**💐💐

***मेहनती मजदूर***


💐जीवन :------हर एक के लिये जीवन की परिभाषा अलग-अलग है ।
जब तक हम स्वयं तक सीमित रहते हैं ,तब तक हमें जीवन वैसा ही लगता है ,जैसा हम देखते और सोचते हैं। परन्तु जब हम स्वयं से बाहर निकल कर समाज,देश, दुनियाँ को देखते हैं ,तब ज्ञात होता है ,कि जीवन की परिभाषा सब के लिये भिन्न -भिन्न है ।

💐मनुष्य जब तक स्वयं तक सीमित रहता है ,वो सोचता है ,कि सबसे ज्यादा अभावग्रस्त वो ही है ,जितनी मुश्किलें और बंदिशें उसके पास हैं ,उतनी किसी के हिस्से में नहीं । परन्तु जब हम अपने घर से बाहर निकलकर देखते हैं तो ऐसे-ऐसे कष्टों में लोग जी रहे होते है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते ,तब हम पाते हैं कि हम तो बहुत बेहतर जीवन जी रहे है ,अभी तक हम बस यूँ ही रोते रहे ।
मन ही मन को ढांढस बन्धता है ,कहता है ,देख ये कैसे -कैसे जीवन जी रहे हैं ।

एक बार तपती दोपहरी में मेहनती मजदूरों को काम करते देख दिल पसीजा साथ में ही उनकी पत्नियां बच्चे सब के सब लगे हुए थे। कोई महिला इंठों का तसला सिर पर उठाए कोई रेते का बच्चे भी वहीं खेल रहे हैं मिट्टी में उन्हें कोई चिन्ता नहीं ।
आखिर मैं एक मजदूर से पूछ बैठा तुम इतनी मेहनत करते हो ,फिर भी शिकवा -शिकायतों का नाम नहीं ।। मजदूर बोला वक्त किसके पास है साहब ,भगवान ने जो दिया है ,खुश है हम हमारे कर्म और हमारा नसीब ,शिकायतों के लिये समय ही नहीं ।

अजी सबसे पहले तो पापी पेट का सवाल है दो वक्त की रोटी कमाने में ही सारा दिन बीत जाता है ,किससे शिकायत करें ,जितना कमाते हैं ,उतना खाते हैं अगले दिन फिर वही ।
कर्मों की खेती करनी है ,जो बीज बोयेंगे वही फ़सल होगी क्यों अपने कल की चिन्ता में आज भी खराब करें ,जो बोयेंगे वही काटेंगे ।इसलिये साहब हम चिन्ता, शिकवा, शिकायतों से दूर ही रहना पसंद करते हैं ।
किससे शिकायत करें और क्यों ,साहब हमें बचपन से ही सिखाया गया है कि अपने से नीचे वालों को देखो ,संतुष्ट रहोगे ।ये नहीं कि हमें बेहतर करने की चाह नहीं ,हम तो अपना सफर जारी रखते हैं ,मुश्किलों से हम डरते नहीं चलना और रास्ते निकलना हमारा काम है ,ये जो साहब आप बड़े-बड़े मंजिलों वाले घरों में रहते हैं ना इन्हें हम ही बनाते है ,जिस दिन हम मजदूरों ने हार मान ली  ना उस दिन से तरक्की रुक जायेगी ,हम मजदूर हैं साहब हम बहता हुआ पानी हैं साहब  हमें जहाँ रास्ता मिलता है हम चलते हैं । आराम तो हम तब ही करते हैं जब परमात्मा हमें विश्राम देता है ।
उस मजदूर की बातों का मेरे दिलों दिमाग़ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा ,वास्तव में ये जो बहुमंजिला इमारतें बड़े-बड़े घरों के रूप में और बड़े-बड़े शहरों की तरक्की का पर्याय हैं ,वो हमारे मेहनती मजदूरों की अटूट मेहनत का प्रमाण है ।
*एक सलाम मेहनती मजदूरों के नाम *

💐**बचपन से हमने देखा है**💐


 💐भारत की पृष्ठ भूमि पर हर 
 मज़हब शान से जीता है ।💐
 बचपन से हमने देखा है ,
 चाहे मुबारक* ईद* हो या* दीवाली *
 हमारे लिये अवकाश संग खुशियों  की सौग़ात का 
 तोहफ़ा होता है।💐💐
हम तो ईद हो या दीवाली सबमें प्रफुल्लित होते हैं ।
💐👍मुबारक ए ईद💐पर भी इबादत अमन चैन की  
   दुआ संग हर्षोल्लास से खुशियां बाँटी जाती है
   और जी जाती है।
 *दीपावली पर भी प्रभु प्रार्थना संग
  खुशियाँ बांटी जाती हैं ,और ज्ञान के
  प्रकाश का उजाला किया जाता है ।
  तातपर्य सभी का एक है ,अमन-प्रेम सुख -शांति का संदेश ।
💐💐रामायण, हो या कुरान सभी तो प्रेम संग 
भाईचारे का संदेश देते है ।
हमने तो बचपन से खुशियों को बाँटने की 
परम्परा निभायी है ।
ईद हो दीवाली हमारे चेहरों पर हर पल खुशी आयी है
हमने तो हर त्यौहार पर भाईचारे की रीत निभायी है ।

आओ अच्छा बस अच्छा सोचें

 आओ कुछ अच्छा सोचें अच्छा करें , अच्छा देखें अच्छा करने की चाह में इतने अच्छे हो जायें की की साकारात्मक सोच से नाकारात्मकता की सारी व्याधिया...