"वियय पर्व " "अच्छाई का बुराई पर "

अच्छाई की बुराई पर जीत का पर्व विजयदशमी ।
परमात्मा करे कलयुग में भी कोई रामचन्दर आयें और
मनुष्य की आत्माओं के विचारों और व्यवहारों में पल पोस रहे रावणों को मार गिराये ।

मेरा -मेरा करता मानव , आज बन गया है तू दानव ।
 रावण भी खाली हाथ गया तू गया ले जायेगा संग
शुभ कर्मों की फसल उगा ले मीठी वाणी का प्रसाद
फिर रह जायेगा तेरे जाने के बाद ऐ मानव तेरा नाम ।।

हर वर्ष रावण के पुतले जलाने से अच्छा है ,हम मनुष्य अपने विचारों और व्यवहारों से जो रावण रुपी दुष्कर्मों जैसे द्वेष द्वन्द नफ़रत ईर्ष्या जलन पल रहे दुष्कर्मों का अन्त करे ।
मेरा तो मानना है कि,विजय दशमी का पर्व अवश्य मनायें
रावण का पुतला अवश्य जलायें ,परन्तु इसके पीछे के सत्य को जाने और अपने अन्दर के रावण रुपी अंहकार को भी परस्पर प्रेम की जोत से मुस्कान से सहर्ष मार डालें । 

टिप्पणियाँ

  1. रितु जी, बिल्कुल सही कहा आपने कि हर वर्ष रावण के पुतले जलाने से अच्छा है,हम मनुष्य अपने विचारों और व्यवहारों से जो रावण रुपी दुष्कर्मों का अंत करें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. रीतू जी ,जटिल विषय पर इतने सुंदर ढंग से रचना करना तो आपकी विशेषता हमेशा ही रही है आपको सुंदर रचना की बधाई ....

    एक नई दिशा !

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

काश की वो वक्त वहीं थम जाता । हम बड़े न होते बच्चे ही रह जाते । पर क्या करें की प्रकर्ति का नियम है ,बचपन , जवानी बुढ़ापा , दुनियां यूं ही चलती रहती है । जिसने जन्म लिया है ,उसकी मृत्यु भी शास्वत सत्य है उससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता ये एक कड़वा सच है । हम बात कर रहे थे ,बचपन की , बचपन क्यों अच्छा लगता है । बचपन में हमें किसी से कोई वैर नहीं होता । बचपन का भोलापन ,सादगी ,हर रंग में रंग जाने की अदा भी क्या खूब होती है । मन में कोई द्वेष नहीं दो पल को लड़े रोये, फिर मस्त । कोई तेरा मेरा नहीं निष्पाप निर्द्वेष निष्कलंक मीठा प्यारा भोला बचपन । ना जाने हम क्यों बड़े हो गये , मन में कितने द्वेष पल गये बच्चे थे तो सच्चे थे , माना की अक्ल से कच्चे थे ,फिर भी बहुत ही अच्छे थे , भोलेपन से जीते थे फरेब न किसी से करते थे तितलियों संग बातें करते थे , चाँद सितारोँ में ऊँची उड़ाने भरते थे प्रेम की मीठी भाषा से सबको मोहित करते थे । बच्चे थे तो अच्छे थे । 

**औकात की बात मत करना **

*अन्नदाता *