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**आँगन की कली**

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आँगन की कली *जब मैं घर में बेटी बनकर जन्मी सबके चेहरों पर हँसी थी , हँसी में भी ,पूरी ख़ुशी नहीं थी, लक्षमी बनकर आयी है ,शब्दों से सम्मान मिला । माता – पिता के दिल का टुकड़ा , चिड़िया सी चहकती , तितली सी थिरकती घर आँगन की शोभा बढ़ाती । ऊँची-ऊँची उड़ाने भरती आसमाँ से ऊँचे हौंसले , सबको अपने रंग में रंगने की प्रेरणा लिए माँ की लाड़ली बेटी ,भाई की प्यारी बहना ,पिता की राजकुमारी बन जाती । एक आँगन में पलती,   और किसी दूसरे आँगन की पालना करती । मेरे जीवन का बड़ा उद्देश्य ,एक नहीं दो-दो घरों की में कहलाती । कुछ तो देखा होगा मुझमे ,जो मुझे मिली ये बड़ी जिम्मेदारी। सहनशीलता का अद्भुत गुण मुझे मिला है , अपने मायके में होकर परायी ,  मैं ससुराल को अपना घर बनाती । एक नहीं दो -दो घरों की मैं कहलाती । ममता ,स्नेह ,प्रेम ,समर्पण  सहनशीलता  आदि गुणों से मैं पालित पोषित                                                                                                     मैं एक बेटी ,मैं एक नारी …. मेरी  परवरिश  लेती है , जिम्मेवारी , तभी तो धरती  पर सुसज्जित है , ज्ञान, साहस त्याग समर्पण प्रेम से फुलवारी    , ध…

* योग्यता को आरक्षण की लाठी की आव्य्शाकता नहीं *

बस अब और नहीं आरक्षण की आड़ में राजनीति अब और नहीं,आरक्षण की चाह ,और इतना भक्षण अपने स्वार्थ के लिये अन्य लोगों को नुकसान पहुँचना । 6h
बन्द करो बस बन्द करो,योग्यता को आरक्षण की लाठी की आव्य्शाकता नहीं *
आरक्षण का ये घिनौना खेल बन्द करो ,आरक्षण का की आड़ में अपनी मात्रभूमि में आतंक ना फैलायें आज देश
में वो स्थिथि आ चुकी की है ,आरक्षण के हकदार वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर लोगे ही होने चाहिये , अगर किसी भी व्यक्ति में योग्यता है तो दुनियाँ की कोई ताकत आपको आगे बढने से नहीं रोक सकती ,योग्यता के आधार पर आगे बढिए ,आरक्षण की लाठी लेकर आगे बढना यानि स्वयं को कमजोर समझना मेरी देश वासियों से विनती है ,कृपया आरक्षण के नाम पर दँगा फसाद ना फैलाएँ स्वयं को काबिल और सक्षम बनाएँ अपनी क़ाबलियत व् योग्यता के बल पर आगे बढिए ,क्या बहते हुए पानी को कोई रोक पाया है क्या कभी रोशनी की हल्की सी किरण भी अगर जो हो तो वो झरोंकों से बाहर निकल ही जाती है ,योग्यता को आरक्षण की लाठी की कोई आवय्शकता नहीं योग्यता को अपाहिज न बनाइये 

* वीर सिपाही हम*

शोला हम,चिंगारी हम
आँधियों के वेग की हिस्सदारी हम
सूर्य के समान हम में है तेज
हिमखंडों की भांति शीतल भी हम ,
हिमालय सा विशाल सीना है ,अपना
धीर भी हम ,वीर भी हम ।
मात्रभूमि की रक्षा प्रहरी हम ,
मात्रभूमि के  सच्चे सपूत हैं हम ,वीर सिपाही हम।
आँधियों से लड़ना शौंक है अपना
तूफानों में तैरती कश्तियाँ हैं,अपनी ।
आँखों में भरें हैं अंगारे ,बाजुओं में फौलाद है ,अपनी
एक धाहड़ भी जो मारे तो ,दुश्मन भाग जाते लौट के उलटे पाँव । मात्रभूमि की आन में ,मात्रभूमि की शान में
हम वीर सिपाही खड़े ,हैं बन देश के रक्षा प्रहरी ।
मात्रभूमि है ,माँ के जैसी । माँ की ममता है ,कवच हमारी
जो शून्य डिग्री के तापमान में रहकर भी चलती रहती है सांसें हमारी ।
मात्रभूमि के विरोध में जो एक आवाज भी उठ जाये तो माफ़ नहीं होगी गद्दारी ।।देश की रक्षा है, अपनी जिम्मेदारी ।
हनुमत थप्पा सी साँसे हमारी ।
वीर भगत सिंह,मंगल पांडे ,लक्ष्मी बाई महाराणा प्रताप जैसे
कई वीरों से सुसज्जित है , भारत माँ के हर आँगन की किलकारी।।।।


" गँगा मात्र सरिता नहीं माता गँगा है "

पावनी माँ गँगा की अविरल जलधारा ,गँगा मात्र सरिता नहीं ,यह हम भारतीयों के लिए अमृत है ,संजीवनी है ।यह जन-जन की आस्था और विश्वास ही तो है ,गँगा जी को गँगा माता कहकर बुलाते हैं ।हमारे पुराने ग्रंथों में लिखा है की ,राजा सगर साठ हजार पुत्रोँ को मुक्ति दिलाने के लिए भागीरथ ने घोर तपस्या की थी अनन्तः भगवन शिव ने प्रसन्न होकर गँगा की अविरल धरा को धरती पर प्रवाहित किया ,गंगा की प्रचण्ड वेगधारा जो अपने साथ सम्पूर्ण जग को जलमग्न कर देती ,तब शिवजी ने गँगा की अविरल धारा को अपनी जटाओं में समाहित करते हुए धीरे-धीरे धरती पर छोड़ा ,जिस तरह गंगा ने महाराजा सागर साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया ,उसी तरह गंगे मैया आज तक जन-जन का उद्धार करती आ रही है । गँगा की महिमा उतुलनीय है । गँगा जी में कुम्भ मेले का भी विशेष महत्व है ,प्रत्येक बारह वर्ष के पश्चात कुम्भ मेला होता है ,और छह वर्ष में अर्ध कुम्भ मेला यह मेला इस वर्ष हरिद्वार में है ,निरन्तर जंगलों में योगसाधना ,तपस्या हवन यज्ञ आदि कर रहे ऋषि मुनि साधू कुम्भ मेले के दौरान माँ गंगा की अमृतमयी जलधारा में स्नान करने आते है ,सम्पूर्ण वातावरण आध्यात्मिकता से ओ…