''   दर्पण ''

         शायद मेरा दर्पण मैला है ,यह समझ ,
मै उसको बार -बार साफ़ करता। 
दाग दर्पण में नहीं , मुझमे है, मुझे यकीन नहीं था। 
  
परन्तु एक मसीहा जो हमेशा मेरे साथ चलता है ,
मुझे अच्छे बुरे का विवेक कराता है ,मेरा मार्गदर्शक है ,
मुझे गुमराह होने से बचाता है। 
पर मै मनुष्य अपनी नादानियों से भटक जाता हूँ ,
स्वयं को समझदार समझ ठोकरें पर ठोकरें खाता  हूँ। 
दुनियाँ की रंगीनियों में स्वयं को इस क़दर रंग लेता हूँ ,
कि अभद्र हो जाता हूँ ,  फिर दर्पण देख पछताता हूँ। 
   
रोता हूँ ,और फिर लौटकर मसीहा के पास जाता हूँ '
उस मसीहा परम पिता के आगे शीश झुकता हूँ ,
उस पर भी अपनी नादानियों के इल्जाम मसीहा पर लगता हूँ। 
वह मसीहा हम सब को माफ़ करता है ,
वह मसीहा हम सब की आत्मा में बैठा परम पिता परमात्मा है।

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