नारी असतित्व

मैं हूँ प्रभु का फरिशता,
मुझसे है,हर प्राणी का दिली रिश्ता,
मुझमें समता,मुझमें ममता,
मैं नारी ह्रदय से कोमल हूँ।
फूलो सा जीवन है मेरा,
काँटों के बीच भी खिलखीलाती हूँ।
मुझसे ही खिलता हर बाग का फूल,
कभी-कभी चुभ जाते है मुझे शूल।
मैं नारी हूँ,
मुझसे  ही  असतित्व,
मुझे से ही व्यक्तित्व,
फिर भी पूछे मुझसे पहचान मेरी,
मुझसे ही है ए जगत शान तेरी,
फिर भी तेरे ही हाथों बिकी है,
आन मेरी।
हर पल अग्नि-परिक्षाए देती हूँ,
मैं ममता की  देवी हूँ,
 हर-पल स्नेह लुटाती हूँ,
मैं नारी हूँ,नहीं बेचारी हूँ, 
करती जगत कि रखवाली हूँ। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

काश की वो वक्त वहीं थम जाता । हम बड़े न होते बच्चे ही रह जाते । पर क्या करें की प्रकर्ति का नियम है ,बचपन , जवानी बुढ़ापा , दुनियां यूं ही चलती रहती है । जिसने जन्म लिया है ,उसकी मृत्यु भी शास्वत सत्य है उससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता ये एक कड़वा सच है । हम बात कर रहे थे ,बचपन की , बचपन क्यों अच्छा लगता है । बचपन में हमें किसी से कोई वैर नहीं होता । बचपन का भोलापन ,सादगी ,हर रंग में रंग जाने की अदा भी क्या खूब होती है । मन में कोई द्वेष नहीं दो पल को लड़े रोये, फिर मस्त । कोई तेरा मेरा नहीं निष्पाप निर्द्वेष निष्कलंक मीठा प्यारा भोला बचपन । ना जाने हम क्यों बड़े हो गये , मन में कितने द्वेष पल गये बच्चे थे तो सच्चे थे , माना की अक्ल से कच्चे थे ,फिर भी बहुत ही अच्छे थे , भोलेपन से जीते थे फरेब न किसी से करते थे तितलियों संग बातें करते थे , चाँद सितारोँ में ऊँची उड़ाने भरते थे प्रेम की मीठी भाषा से सबको मोहित करते थे । बच्चे थे तो अच्छे थे । 

*****उम्मीद की किरण*****

**औकात की बात मत करना **