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अमृत की रस धार 
कविता नहीं तो कवि नहीं,रस नहीं श्रृंगार नहीं। कविता मात्र शब्दों का संग्रह  नहीं , भावनाओं का अद्धभुत संगम है ,  अमृत की रसधार है।
 मन -मस्तिष्क  मे हल -चल  मचा देने वाली अद्धभुत आवाज है। . सुन्दर शब्दों की खान है , भावों का का सम्मान है। कविता कभी वात्स्ल्य ,प्रेम ,करुणा ,श्रृंगार , कभी वीर रस का पयार्य है। कभी प्रकृति की सुन्दरता का बखान है. शब्दों के द्वारा विचारों के रूप में परणित  , भावनाओं के अद्धभुत मेल का सयोंग है।
कविता अंतरात्मा में उठे तूफ़ान की आवाज है. . दिल की गहराइयों में  उतर जाने वाले भावों की आवाज है। कविता जीवन का यथार्थ है, कवियों के जीवन का चरित्रार्थ है। कविता अमरत्व की पहचान है। 





''पोशाकों में छिपा व्यक्तित्व ''                                          आधुनिक मानव का पोशाकों में छिपा व्यक्तित्व , कहतें हैं ,मनुष्य के व्यक्तित्व की पहचान उसकी  पोशाक से होती है।
                     परन्तु आधुनिक मानव की पोशाकों का क्या                    कहना ,किसी भी मानव का व्यक्तित्व सिमट कर रह गया है ,उसकी  पोशाकों में , जितनी आड़ी तिरछी पोशाक उतना ही वह धनवान आधुनिक।  नैतिकता का कोई नाम नहीं ,अनैतिकता का है बोलबाला।  आधुनिकता की दौड़ में अंधों की तरह दौड़ रहा है आज का मानव , भले बुरे का विवेक नहीं ,   दुष्कर्मों का कोई खेद नहीं। 
 अभद्रता ,अश्लीलता ,में डूबा आज का समाज  धिक्कार है धिक्कार है।  प्रसिद्धि पाने का अभद्र तरीका।    मदर टेरिसा ,इन्दिरा ग़ांधी ,इत्यादि ऐसी कई महान हस्तियों का व्यक्तित्व है मिसाल ,की मनुष्य की साधारण पोशाकों में भी बन सकती है ऊँची पहचान।   प्रसिद्धि पाने का अभद्र तरीका ,  कुछ एक ने लोभ में बेची है अपनी लाज। 
भारत माता आज खतरे में ,   है तेरे दुलारों का , मान सम्मान। मनुष्य के कर्मों में हो नैतिक…
                         ''खूबसूरत '' 
जिंदगी इतनी खूबसूरत हो सकती है ,
किसे पता था। 
मैंने प्रेम की जोत जलाई तो सारा जहाँ रोशन हो गया। 
जब नफ़रत के बीज थे ,तब कांटे -ही कांटे थे। 
बाह्य ख़ूबसूरती ही ख़ूबसूरती नज़र आती थी ,
बाह्य ख़ूबसूरती को ख़ूबसूरती समझ कई बार धोखे खाये। 
अब मैं आंतरिक यात्रा पर निकली हूँ ,
अंदर कभी झाँक -कर नहीं देखा था ,
ख़ूबसूरती का आइना मन है ,ज्ञात नहीं था ,
ख़ूबसूरती शुभ विचारोँ की निर्मलता और 
सत्यता का शृंगार 
विचारों की झाँकी चेहरे पर आ जाती है 
चेहरे केआइने  में झलक दिखला जाती है ,
मन के आइने में झलक दिखला जाती है 
अब आन्तरिक सुन्दरता पर ध्यान केन्द्रित किया है ,
प्रेम त्याग ,दया क्षमा ,आदि बन मन के हार श्रृंगार 
बड़ा रहे हैं ,चेहरे का नूर ,
विकारों से दूर , मज़हब मेरा परस्पर  प्रेम से पूर्ण 
अपना लिये हैं अपनत्व के सारे गुण ,
अपनत्व के बीज ,परस्पर प्रेम की खाद ,
ख़ूबसूरती का राज़ , ख़ूबसूरती का राज़।
जूनून
जो दिल से निकलती  ,है वही सच्ची कविता होती है , दिल में जो आग है ,तूफ़ान है  कुछ कर गुजरने का जनून है ,ऐसे लोगो को  कहाँ  सुकून है। 
दिल की हलचल ही तो वरदान है।  मनुष्य तो यूँ ही बदनाम है।  नेकी की राह चलना नहीं बहुत आसान है।  नेकी की राह पर चलने वाले मा ना  की बहुत कम हैँ। 
पर नेकी की राह पर चलने वालों की जिद्द के आगे आसमां भी बुलंद है।  यही तो जीवन का द्वन्द है , लोग क्या कहेंगे की छोड़ो  , दिल में जो  आग है , उसे करके छोड़ो।   माना की राहें बहुत तंग हैं , रोशनी के घरौंदे  तले  अँधेरा  बहुत है 
जिनके जीवन में उम्मीदों का संग है,  उन्हें मुश्किलों से लड़ जाना पसंद है। उम्मीदें ही तो भरती जीवन में नया रंग हैं। जीवन के केनवास  में सुन्दर  रंग भरना  भी एक कला है , नेकी की राह पर चलकर मंजिल पा जाने  वाले को मिलता परमानन्द है।
सत्संग औषधि       यूँ तो हमारे शहर में कई कथाओं का आयोजन होता रहता है ,कुछ समय पूर्व हमारे घर से कुछ ही दूरी पर भागवत कथा का आयोजन हुआ ,कोई बहुत बड़े संत आ रहे थे , हम एक दो पड़ोसियों ने मिलकर प्रोग्राम बनाया की हम रोज भागवत   सुनने जाएंगे ,हम चार महिलाओं की सहमति हो गयी ,आखिर कथा का दिन आ गया ,हम चारों महिलाएं घर का सारा काम निपटा के अच्छे से तैयार होकर घर से चल दी। हमारी चेहरों की चमक ही अलग थी ,चेहरों के हाव -भाव दिल की ख़ुशी ब्यान कर रहे थे। तभी राह चलते -चलते एक महिला मिल गयी ,बोली क्या बात है इतने अच्छे से तैयार होकर कहाँ जा रही हो, शॉपिंग पर जा रही हो क्या /....  कोई सेल लगी है क्या। …?  इस पर हम चारों महिलाएं मुस्करा दी और बोली हाँ लगी है ,चलो तुम भी चलो ,वह बोली नहीं आज नहीं कल चलूंगी यह सैल कितने दिन चलेगी ,मैंने बोला आठ दिन और हम सब तो आतों दिन जाएंगी ,इस पर वह महिला बोली आठों दिन ज्यादा पैसा आ रहा  क्या। …? कितनी शॉपिंग करोगी ?   इस पर मै बोली इस सेल मै पैसा नहीं लगता ,  वह महिला फिर चकित ----- ऐसे कौन सी सेल है ,जहां पैसा नहीं लगता मै भी चलूँगी।        अगले दिन वह महिला भी तैयार …
'' खुला दरवाजा ''           

आज मैं कई महीनों  बाद अपने दूर के रिश्ते की अम्मा जी  से मिलने गयी।  ना जाने क्यों दिल कह रहा था ,की
ऋतु कभी अपने बड़े -बुजर्गों से भी मिल आया कर। आज कितनी अकेली हैं वो अम्मा ,  कभी वही घर था ,
भरा पूरा , अपने चार बच्चे ,  देवर -देवरानी उनके  बच्चे ,  सारे दिन चहल -पहल  रहती थी ,  ये नहीं की  मन मुटाव नहीं होते  थे , फिर भी दिलों मे मैल नहीं था।  दिल लगा  रहता था  मस्त।
मुझे याद है , जब  उनके बडे बेटे की शादी  हुई थी , बहुत खुश थी  अम्मा  की बहू आएगी  ,चारों तरफ  खुशियाँ होगी ,पोते -पोतियों  को खिलाऊँगी  ,कुछ महीने तो सब ख़ुशी -ख़ुशी  चलता रहा , परन्तु अचानक एक दिन
बेटे की नौकरी का तबादला हो गया , वह तबादला ट लने वाला नहीं था ,बस क्या था बहू बे टा दूसरे शहर बस गए।
एक एक करके चारों बेटों की शादियाँ  हो गयी।   सब कुछ ठीक से चलता रहा ,परन्तु  आज वो सयुंक्त  परिवार में रहने वाली अम्मा  जिसके सवयं के चार बेटे -बहुएँ  पोते -पोतियाँ  हैं ,सब अपने अलग -अलग मकानों में अलग जिंदगियाँ बिता रहें हैं।  
बूढ़ी अम्मा के घर का दरवाजा यूँ ही बंद रहता …
' हर -हर गंगे ' मै हूँ ,भारत की पहचान , भारतवासियों का अभिमान ,मा गंगा कहकर करतें हैं  सब मेरा सम्मान , सबके पाप पुण्य मुझे ही अर्पण ,मै हूँ निर्मलता का दर्पण , हिमालय की गोद से निकली ,गंगोत्री है मेरा धाम , शिव की जटाओं से नियन्त्रित ,प्रचण्ड वेग ,पवित्रतम गंग धारा।  सूर्य के तेज से ओजस्वी ,चन्द्रमा की शीतलता लिए ,चांदी सी , चमकती ,पतित पावनी पापों को धोती ,गतिशीलता  ही मेरी पहचान   भक्तों की हूँ ,मई आन बान और शान , गंगा जल से पूर्ण होते हैं सब काम , भगीरथी सुरसरि गंगे मैया इत्यादि हैं मेरे कई नाम ,   भक्त गंगे मैया गंगे मैया ,कहकर करते हैं जीवन नैया पार  युगों युगों से करती आई, भक्तों के जीवन का उद्धार  अपने भक्तों के पाप पुण्य सब मुझे हैं स्वीकार।
''  मेहनती हाथ  '' मेहनत मेरी पहचान ,मैं  मजदूर मजे से दूर।  धनाभाव के कारण  थोड़ा मजबूर , मैले कुचैले वस्त्र मिट्टी से सने हाथ।  तन पर हज़ारों घात कंकाल सा  तन 
मै मज़दूर कभी थकता नही , क्या कहूँ थक के चूर -चूर  भी हो जाऊं पर कहता नहीं। 
क्योंकि में हूँ मजबूर  मज़दूर------ मेरे पसीने की बूँदों से सिंचित बड़ी -बड़ी आलीशान ईमारतें  देख -देख सवयं पर नाज़ करता हुँ।  और अपनी टूटी -फूटी झोपड़ियों मे खुश रहता हूँ। 
यूं तो रहते हैं सब हमसे दूर , पर बड़े -बड़े सेठ हम से काम करवाने को मज़बूर  मजदूरों के बिना रह जाते हैं बड़े -बड़े आलिशान इमारतों के सपने अधूरे ----- में मजदूर सबके बड़े काम का ,फिर भी त्रिस्कृत  नहीं मिलता अधिकार मुझे मेरे हक का , में मजदूर बड़े काम का । 

''   दर्पण ''
         शायद मेरा दर्पण मैला है ,यह समझ , मै उसको बार -बार साफ़ करता।  दाग दर्पण में नहीं , मुझमे है, मुझे यकीन नहीं था।  परन्तु एक मसीहा जो हमेशा मेरे साथ चलता है , मुझे अच्छे बुरे का विवेक कराता है ,मेरा मार्गदर्शक है , मुझे गुमराह होने से बचाता है।  पर मै मनुष्य अपनी नादानियों से भटक जाता हूँ , स्वयं को समझदार समझ ठोकरें पर ठोकरें खाता  हूँ।  दुनियाँ की रंगीनियों में स्वयं को इस क़दर रंग लेता हूँ , कि अभद्र हो जाता हूँ ,  फिर दर्पण देख पछताता हूँ।  रोता हूँ ,और फिर लौटकर मसीहा के पास जाता हूँ ' उस मसीहा परम पिता के आगे शीश झुकता हूँ , उस पर भी अपनी नादानियों के इल्जाम मसीहा पर लगता हूँ।  वह मसीहा हम सब को माफ़ करता है , वह मसीहा हम सब की आत्मा में बैठा परम पिता परमात्मा है।
देने के सिवा मुझे  कुछ आता नहीं !!!!!                                                               एक दिन मैंने पुष्प से पुछा                                                          आकाश की छत  मिटटी की गोद ,                                                        क्या कारण  है जो काटों के  बीच भी,                                                              बगीचो की शोभा बढ़ाते  हो ,                                                    दुनिया को रंग-बिरंगा खूब सूरत बनाते हो                                                                   मुस्कुराहटें  फैलाते हो।
                                                           उदास चेहरों पर हँसी  ले आते हो                                                            इत्र बनकर हवा में समा  जाते हो                                              अपने इस छोटे से जीवन में जीने का अर्थ बता जाते हो                                                                ख़ुशी का सबब बन जाते हो।
                                                          पुष्प ने …
"क्योंकि वह दूर की सोचते थे"
{ -   कहते है न देर आये दुरुस्त आये  -३ }       सीधा,सरल और सच्चा रास्ता थोडा लम्बा और कठिनाइयों भरा अवश्य हो सकता है,परन्तु इसके बाद जो सफलता मिलती है,वह चिर स्थाई होती है।यह विषय मेरा पसंदीदा विषय है।
       माना कि,आज के युग मैं सीधे -सरल लोगो को दुनियाँ मूर्ख समझती है,या यूं कहिए कि ऐसे लोग ज्यादा बुधिमान लोगो कि श्रेणी मैं नहीं आते।  परन्तु वास्तव मैं वे साधारण लोगो कि तुलना में अधिक बुद्धिमान  होते है क्योंकि वह दूर कि सोचते है।  भारतीय पौराणिक इतिहास मैं सच्ची घटनाओ  पर आधारित कई ऐसे महाकाव्य है,उन महाकाव्य में महान व्यक्तियो जीवन चरित्र किसी भी विकट परिस्थिति  मैं सत्य और धर्म कि  राह  को न छोड़ने वाले जीवन चरित्र अदभुद अतुलनीय अमिट छाप छोड़ते है।
  रामायण,महाभारत उन्ही महाकाव्यों में से एक हैं। यह सिर्फ महाकाव्य ही नहीं परन्तु आदर्श जीवन कि अनमोल सम्पदाएँ हैं।

       मर्यादा पुरोषत्तम ''श्री राम '' प्राण जाए पर वचन न जाए
क्या रावण जैसे महादैत्य को मारने वाले श्री राम कभी कमजोर हो सकते हैं। राम जी…
किस्मत की  छड़ी 
सुन्दर सभ्य स्वर्ग तुल्य समाज की चाह रही है.   परीक्षाफल की समीप घडी है, वोटरों के हाथ नेताओं की किस्मत की छड़ी है , रजनीतिञ कुर्सियों की दिल की की धड़कन बड़ी है। अड़चन बड़ी है,कौन होगा मेरा  सही उम्मीदवार , बेसब्री से हो रहा इंतजार  कुर्सी की तो बस इतनी सी चाह है  जो हो मेरा उम्मीदवार वो हो ईमानदार,वफादार  
अपनी तो सभी करते है नैय्यापार, पर नेता वही जो स्वार्थ  से ऊपर उठकर करे देश का करे  उद्धार।   भाईचारा,परस्पर प्रेम हो जिसका व्यवहार , सुन्दर सभ्य स्वर्ग तुल्य समाज का हमारा सपना हो साकार।
क्योंकि है,अप्रैल फूल   एक झाड़ू कि लगी थी फैक्ट्री, हो गई उसके साथ एक बड़ी ट्रेजेडी,  भ्रष्टचार के कीचड़ को साफ़ करने को ज्यों झाड़ू उठाई, सभी कि आफत बन आई, सबसे पहेले कमल को चिंता सताई, कीचड़ मैं ही कमल का घर, हाथ भी कीचड़ मैं तर।  बीच मझदार मैं झाड़ू कि नैय्या डुबाई। कीचड़ मैं भर-भर के हाथ खिल रहे थे कमल के फूल।  हाथी ने दहाड़ मरी, उड़ाते हुए मस्ती मैं धूल सारी , कीचड़ ही कीचड़ दुनिया सारी, तभी हाथी के हाथ आ गया,एक फूल जिसका नाम था.……        अप्रैल फूल।  माफ़ करना हो गई हो जो भूल,  क्योंकि है अप्रैल फूल।
''कहतें हैं,ना देर आये दूरस्थ आये''


                                                  """""बस थोडा सा प्रोत्साहन"""""

सफलता और असफ़लता जीवन के दो पहलू हैं। एक ने अपने जीवन में सफलता का भरपूर स्वाद चखा है उसकी सफलता का श्रेय सच्ची लगन ,मेहनत ,दृढ़ -इचछाशक्ति ,उसका अपने कार्य के प्रति पूर्ण- निष्ठां व् उसके विषय का पूर्ण ज्ञान का होना था। और उसके व्यक्तित्व में उसकी सफलता के आत्मविश्वास की छाप भर -पूर थी। वहीं दूसरी तरफ़ दूसरा वयक्ति जो हर बार सफलता से कुछ ही कदम दूरी पर रह जाता है ,उसके आत्म विश्वास के तो क्या कहने, परिवार व् समाज के ताने अपशब्द निक्क्मा ,नक्कारा ,न जाने कितने शब्द जो कानों चीरते हुए आत्मा में चोट करते हुए ,नासूर बन दुःख के  सिवा कुछ नहीं देते।
उसे कोई चाहिये था जो उसके आत्म विशवास को बड़ा सके,  उसे उसके विषय का पूर्ण  ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करवाये । जीवन  में आने वाले उतार -चढ़ाव कि पूरी जानकारी दें ,और सचेत रहने की भी पूरी जानकारी दे। उसे  सरलता का भी   महत्व  भी  समझाया       गया  ,सरलता का मतलब मूर्…
''चुनाव  नेताओं का ''
ज्यों  परिक्षा से पहले की मेहनत अधिक रंग लाती है , त्यों चुनाव से पहले की मेहनत अधिक रंग लाती  है। 
  चुनाव से पहले हर एक नेता देशभक्त नज़र आता है।  खिले -खिले मुस्कराते चेहरे ,बड़े- बड़े वादे ,सर्वांगीण  विकास ,सबको सामान अधिकार ,मनोवांछित फल , का आश्वासन देते ,  नेता भी देवता नज़र आते हैं। 
एक -एक वोटर को चुनकर अपने हक़ में करना है , क्योंकि चुनाव से पहले की मेहनत काम आती है।  बेचारी जनता हर बार धोखा खा जाती है , जो जनता चुनाव से पहले नेताओं का सहारा होती है , वही जनता नेताओँ को राजनीती कि कुर्सी मिल जाने पर ,  सवयं बेसहारा हो जाती है। 
चुनाव आते हैं 'जाते हैं ,सिलसिला चलता रहता है  नेताओं कि तरक्की होती है,जनता वहीँ कि वहीँ रह जाती है।  जंहाँ जीत के जश्न में नेताओ को मिलती है दिली ख़ुशी, वंही जनता की बन जाती है भीगी-बिल्ली।
नारी असतित्व

मैं हूँ प्रभु का फरिशता,
मुझसे है,हर प्राणी का दिली रिश्ता,
मुझमें समता,मुझमें ममता,
मैं नारी ह्रदय से कोमल हूँ।
फूलो सा जीवन है मेरा,
काँटों के बीच भी खिलखीलाती हूँ।
मुझसे ही खिलता हर बाग का फूल,
कभी-कभी चुभ जाते है मुझे शूल।
मैं नारी हूँ,
मुझसे  ही  असतित्व,
मुझे से ही व्यक्तित्व,
फिर भी पूछे मुझसे पहचान मेरी,
मुझसे ही है ए जगत शान तेरी,
फिर भी तेरे ही हाथों बिकी है,
आन मेरी।
हर पल अग्नि-परिक्षाए देती हूँ,
मैं ममता की  देवी हूँ,
 हर-पल स्नेह लुटाती हूँ, मैं नारी हूँ,नहीं बेचारी हूँ,  करती जगत कि रखवाली हूँ। 
''सवर्ग और नरक '' ''अनमोल वचन ''
दादी और पोते   का लाड़ प्यार उनकी खट्टी  -मीठी  बातें ही  मानो  कहानियों  का रूप  ले  लेती हैं।

 एक बार  एक  पोता  अपनी  दादी से  पूछता  है ,कि दादी  आप  जब मुझे कहानी  सुनाती हो ,उसमे स्वर्ग  की बाते करते हो ,क्या  , स्वर्ग बहुत सुंदर है।   दादी स्वर्ग  कहाँ है /   ?     क्या हम जीते  जी  स्वर्ग नहीं  जा सकते ?

     दादी  अपने  पोते    कि बात सुनकर  कहती है बेटा , स्वर्ग  हम  चाहें  तो  अपने कर्मों  द्वारा इस धरती  को स्वर्ग बना  सकते हैं।

पोता  अपनी  दादी से कहता है   इस धरती को स्वर्ग  वो  कैसे ,  दादी कहती है है ,   बेटा  भगवान ने जब हमें इस धरती  पर  भेजा  ,तो खाली  हाथ  नहीं भेजा  . ,भगवा न ने हमें प्रकृति  कि अनमोल  सम्पदाएँ  ये हवाएँ , नदियाँ , पर्वत ,आदि  दिए अन्य सम्पदाएँ   सूरज ,  चाँद , सितारें  न  जाने क्या -क्या  दिया।

  दूसरी ओर  भगवान ने हमें अ आत्मा कि शुद्धि के लिए  भी  कई रत्न  दिए ,लेकिन बेटा   वह रत्न अदृश्य हैं।  तुम्हे मालूम  है कि वह  रत्न कौन से  हैं ,  

पोता  कहता  है,  नहीं दादी  वह  र…
''कुछ तो लोग कहेंगे ''

जब ज़िंदगी के कैनवास के रंग लगने लगे  बेरंग-------- उसी क्षण  बदल  लेना अपने  जीवन जीने  का ढंग , उदासियों  का न  करना  कभी  संग , उदासियों  के कोहरे को  चीरते  हुए  आगे निकल जाना। 
 माना  कि जीवन है ,'जंग ' फिर भी  जीवन  के हैं कई  रंग।  दिल कि  सुनना , कुछ  तो  लोग कहेंगे , लोगों का ,काम  है कहना। ' रँग बिरंगे रंगो  से जीवन सजा लेना ,
परस्पर प्रेम  का दीप  जला लेना , उम्मीद कि नई किरण ढूंढ लेना , किरण जो ले जाए उजाले कि ओर, तुम्हें रोशन  करे और  सारे  जहाँ को रोशन कर जाए। 
जिंदगी  की जंग  में ,जगा के नई  उमंग।  खुशियों  के संग ,जब होगी नई तरंग।  तब होगा जीवन का शुभ आरम्भ।    

कहते हैं ना,देर आए पर दुरुस्त

सफलता  पर  सभी  का  अधिकार  है। कठिन  परिश्रम सच्ची  लगन  पूर्ण निष्ठा  से  कर्म  करने  के  बावजूद  कभी- कभी  हताशा  और  निराशा  मिलती  है । छोटी -छोटी  बातों  पर अमल  करके  सफलता  की  सीड़ियाँ  चढ़ा  जा  सकता  है। सीधा   सरल  सच्चा  रास्ता  थोड़ा लम्बा  और  कठनाइयों  भरा  हो  सकता  है परंतु   इसके  बाद  जो  सफलता मिलती है। वह चिरस्थाई   और  कल्याणकारी   होती                       “  कहते      हैं    ना  ,     देर     आए    पर    दुरुस्त     आए  ”      कई  बार  व्यक्ति  रातों -रातों  रात  सफल  होना  चाहता  है  वह कई  गलत   तरीके  अपनाता  है । और  सफल  भी  हो  जाता  है  परन्तु  वह  सफलता  टिकती नहीं  क्योंकि  खोखले  कमजोर  साधन  मजबूती  कैसे  दे  सकते  है । फिर शर्मिंदगी  का  सामना करना  पड़ता है।मन में किसी  तरह  का  द्वेष  किसी  का अहित  करने   की भावना या किसी का  अहित  होने का  भाव भी  हमारी  सफलता  में  बहुत बड़ी  बाधा  होता   है। अक्सर  लोग  मानते  हैं की  जितने  भी बड़े  सफल व्यक्ति  हैं।  उनकी  सफलता  के  पीछे  छल -कपट   की  बड़ी  भूमिका  होती  है परन्तु यह  बहुत  ही  गलत  सोच  …
चित्र
''  जिस दिल में मॊहब्बत होती है ''

बस यूँ ही मुस्कराता है गुनगुनाता है ,मुस्कराहटें लुटाता है। मोहब्ब्तों में सब सुंदर हो जाता है , मोहब्ब्तों  में इंसान खुदा  हो जाताहै। मोहब्बतों जिन दिलों में होती हैं उन चेहरों कि रौनके ही ख़ास होती है , दुनियाँ को देखने कि उनकी निगाहें भी ख़ास होती हैं आत्मिक सौन्दर्य से परिपूर्ण , वह  दिल नहीं मन्दिर होता है। प्रेम का समुन्दर लिए इतराता इठलाता अधरों पर गीत बन गुनगुनाता है।   प्रेम , बस यूँ ही मुस्कराता है , मीठी कशिश ,अनकहे शब्दों में सब कह जाता ,   प्रेम , तपती दोपहरी में वृक्ष कि छाया 'संगीत में सुरों कि तरह हवा में सुगंध कि तरह विलीन हो जाता है प्रेम , स्व्यं के लिए तो सभी जीते  है , जो दूसरों के  जीने के लिए जी जाता है , वही है, सच्चा प्रेम।
'''नया  जमाना  आएगा ''

अभी तक जितने नेता हुए , वह नेता जनता के वोटों के आधार पर चुनाव में जीतकर , भिन्न -भिन्न पदो पर मंत्री बन उस पद के कार्यक्षेत्र  कि अर्थव्यवस्था  का कार्य-भर सँभालते  हुए , राजा  बन राज्य करते आए।

आज़ दिन तक सभी नेता देश व् समाज कि भलाई व् सुरक्षा से अधिक  सवयं कि भलाई पर अधिक धयान देते आए हैं।    
जनता कि आवश्यक आवश्कताओं को पूरा करने कि बजाये अपनी आर्थिक  उन्नति पर विशेष ध्यान केन्द्रित करते आये हैं।
मंत्री बनते ही नेताओं के तेवर बदल जाते हैं। वेह मंत्री जो देश व् समाज कि रक्षा के लिए होता है।  सबसे पहले उसकी सुरक्षा के कड़े इन्तजाम हो जाते हैं ,फिर चाहे देश कि सुरक्षा ,उसके लिए जान कि बाजी लगते हैं , हमारे सुरक्षा अधकारी ,देश कि पुलिस और देश का सैनिक।

दूसरी तरफ देश का महा नायक ''अरविन्द केजरीवाल जी ''अपनी सुरक्षा के इंतजामों को ठुकरा कर एक आम  आदमी कि तरह रहना चाहा , यह उनकी महानता को दर्शाता है ,   शायद इसी को  कहते हैं ,


'' सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग  ''    पहली बार…