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'' अग्निकुंड ''   


  क्रोध यानि उत्तेजना ,क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
 क्रोध करने वाला स्वयं के लिए अग्नि-कुंड बनाता है ,और उस अग्नि में सवयं को धीरे -धीरे जलाता है। कुछ लोग मानते हैं
 कि ,क्रोध उनका हथियार है ,सब उनसे डरते हैं ,उनकी ईज्जत करते हैं।
परन्तु क्रोधी स्व्भाव का व्यक्ति यह नहीं जानता कि जो लोग उसके  सामने आँखे नीची करके बात करते हैं ,जी -हजूरी करते हैं वह सब दिखावा है
। वास्तव में वह  क्रोधी व्यक्ति कि इज्ज़त नहीं करते ,पीठ पीछे
 क्रोधी व्यक्ति को खडूस ,नकचढ़ा ,एटमबम ,इत्यादि ना जाने क्या -क्या नाम   देते है। इसके विपरीत सीधे सरल लोगों के प्रति सम भाव रखते हैं।

आज के मानव ने सवयं के आगे पीछे बहुत  कूड़ा -करकट इ क्क्ठा कर रखा है। सवयं के बारे में सोचने का आज के मानव के  पास समय ही नहीं है।  वास्तव में मानव को यह ज्ञात ही नहीं या यूँ कहिए कि ,उसे ज्ञात ही नहीं कि वास्तव में वह चाहता क्या है। 
क्यों कहाँ कैसे किसलिए  वह जी रहा है
। सामाजिक क्रिया -कलापों में सवयं को बुरी तरह जकड़ कर रखा है। बस करना है  ,चाहे रास्ता पतन कि और क्यों न ले जाए।  
 क्योंकि सब चल रह…
''दिल रो पड़ा ''
यात्राएं तो मैने बहुत कि हैं। पर कुछ यात्राएं असमरणीय होती हैं। दिलों दिमाग़ पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। 
महानगरों कि यात्राएं सुविधाओं से पूर्ण होती हैं। 
परन्तु एक बार हमने एक यात्रा के दौरान ट्रैफिक से बचने के लिए हाईवे का रास्ता छोड़ उस रास्ते से यात्रा करनी चाही जिस पर ट्रैफिक का नाम न हो।हाईवे के मुक़ाबले वेह रास्ता काफी कम समय में हमें हमारी मन्जिल तक पहुँचा सकता था। समय बचाने के चक्कर में हमने शार्ट -कट रास्ता अपनाया ,वह रास्ता गावों से होकर जाता था। गावों कि कच्ची सडकें ,समझ नहीं आ रहा था कि सड़को में गढ्ढो हैं या गढ्ढो में सड़क ,गाड़ी में बैठे -बैठे हम उछल रहे थे ,तीन घण्टों में एक भी पल हम चैन से नहीं बैठे ,इतने झूले बचपन में झूले -झूले भी उसके आगे कुछ नहीं थे। गावों के कच्ची मिट्टी से बने घऱ जो एक परिवार के लिए बस सर छिपाने के लिए बस छत भर ही थे ,बरसात के पानी से बचने के लिए छतों पर बिछाये गयी त्रिपाल इत्यादि ठिठुरती सर्दी में तन दो साधारण वस्त्र उस पर शाल या साफ़ा पैरों में मौजों का नाम नहीं बस  साधारण सी चप्पल, उन्हें दे…

सुख समृद्धि

"लक्ष्मी जी संग सरस्वती जी भी आति  आवशयक  है"
शुभ दीपावली ,दीपावली में लक्ष्मी जी के पूजन का विशेष महत्व है,क्यों ना हो लक्ष्मी जी विशेष स्थान ,क्योंकि लक्ष्मी जी ही तो हैं जो,ऋद्धि -सिद्धि धन ऐश्वर्य कि दात्री हैं। परन्तु कहते हैं ,लक्ष्मी चंचल होती है वह एक जगह टिकती नहीं ,इसलिये लक्ष्मी जी के साथ सरस्वती जी का स्वागत भी होना चहिये ,सरस्वतीजी बुद्धि ज्ञान विवेक कि दात्री हैं,लक्ष्मी का वाहन उल्लू है ,यह बात तो सच है कि लक्ष्मी के बिना सारे ऐश्वर्य अधूरे हैं ,परन्तु एक विवेक ही तो है जो हमें भले -और बुरे में अन्तर बताता है।
दीपावली के दिन स्व्छता का भी विशेष महत्व होता  है ,क्योंकि स्व्च्छ स्थान पर देवों का वास होता है। दीपावली के दिन  ऋद्धि- सिद्धि कि देवी सुख समृद्धि के साथ जब घर -घर जायें तो उन्हें सवच्छ सुंदर प्रकाश से परिपूर्ण वातावरण मिले और वो वहीं रुक जाएँ। दीपावली के दिन पारम्परिक मिट्टी के दीयों को सुंदर ढंग से सजाकर पारम्परिक रंगों से रंगोली बनाकर माँ लक्ष्मी का स्वागत करना चाहिए।  आवश्यक नहीं की मूलयवान सजावटी समानो से ही अच्छा स्वागत हो सकता है। भगवान  तो भाव …
भक्ति क्या है ??? भक्ति एक सुंदर  भाव  है। भक्ति दिखावे की चीज नहीं  ,बंधन नहीं  मुक्ति का नाम है,भक्ति।  घंटो  किसी पूजा स्थल पर या फिर मंदिर ,गुरुद्वारे आदि पवित्र स्थलों में बैठकर पूजा करना भी भक्ति ही है। परन्तु भक्ति घंटों किसी स्थल पर बैठ कर ही संभव है यह सत्य नहीं पर यह चिर -स्थाई भक्ति की और ले जाने वाली सीढियाँ हैं।  भक्ति वह भावना है ,जहाँ भक्त का मन या फिर यूं कहिये की भक्त की आत्मा परमात्मा  में स्थिर हो जाती है। भक्त को घंटों किसी धार्मिक पूजा- स्थलपर बैठकर प्रपंच नहीं रचने पड़ते ,वह कंही भी बैठ कर प्रभु को याद कर लेता है।उसका चित परमात्मा में एकसार हो जाता है।  भक्त अपने इष्ट के प्रति निष्काम प्रेम और समर्पण का नाम है। भक्ति श्रधा है। भक्ति बंधन नहीं। मुक्ति है ,भक्ति में भक्त अपने परमात्मा या इष्ट से आत्मा से जुड़ जाता है ज्यों माँ से उसका पुत्र। भक्ति में भक्त को कुछ मांगना नहीं पड़ता। उसका निस्वार्थ प्रेम उसे स्वयमेव भरता है। ज्यों एक माँ अपने पुत्र की इच्छा पूरी करती है। देना एक माँ और पमात्मा का स्वभाव है।  भक्ति निष्काम प्रेम की सुंदर अवस्था है।
हिंदी मेरी मात्रभाषा है माँ तुल्य पूजनीय है 



मेरी मात्रभाषा हिंदी है । मै गर्व से कहती हूँ! जिस भाषा को बोलकर सर्व- प्रथम मैंने अपने भावों को प्रकट किया ,जिसे बोलकर बन जाते हैं मेरे सरे काम ,उस भाषा का मै दिल से करती हूँ  सम्मान। आज विशेषकर भारतीय लोग अपने देश की भाषा अपनी मात्रभाषा को बोलने में स्वयं को छोटा महसूस करते हैं। अंग्रेजी भाषा को प्राथमिकता देकर स्वयं को विद्वान् समझते हैं। मात्रभाषा बोलने में हीनता महसूस करते हैं। हिंदी में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करके समझते हैं की आधुनिक हो गए हैं। क्या  आधुनिकता की पहचान अंग्रेजी भाषा ही है ? अरे! नहीं- नहीं आधुनिकता किसी भाषा पर निर्भर नहीं हो सकती। आधुनिकता किसी भी समाज द्वारा किये गए ,प्रगति के कार्यों से उच्च संस्कृति व् संस्कारों से होती है।जापान के लोग अपनी मात्रभाषा को ही प्राथमिकता देते हैं,क्या वह देश प्रगति नहीं कर रहा ,बल्कि प्रगति की राह में अपना लोहा मनवा रहा है ।
अरे नहीं कर सका जो अपनी माँ सामान मात्रभाषा का सम्मान ,उसका स्वयं का सम्मान भी अधूरा है , खोखला है, अपनी जड़ों से हिलकर हवा में इतराना चाह रहा है । संसार…
" रोना बन्द करो  " 
                                                         अपना भाग्य स्वयं लिखे
 सामन्यता मनुष्य भाग्य को कोसते रहते हैं ,कि मेरा भाग्य अच्छा नहीं ,स्वयं को छोटा समझना कायरता है। 
स्वयं को बड़ा बनाना है तो ,अपने भाग्य का रोना बंद करना होगा। कोई भी मनुष्य छोटा या बड़ा नहीं जन्मता एक सा जन्मता है 'एक सा मरता है। कोई भी मनुष्य कर्म से ही महान होता है। जितनी भी महान हस्तियाँ हुई हैं। वे अपने कर्मो के कारण ही महान हुई हैं। जैसे गांधीजी ,मदर टेरेसा ,स्वामी विवाकानंद ;आ दि।
 गाँधी जी ,के विचार थे ,'सादा जीवन उच्च विचार। मदर टेरेसा अपने पास रखती थी एक थाली एक  लौटा ।ऐसी कई महान हस्तियाँ हुई जो अपने निस्वार्थ कर्मो के कारण महान हुई ,उनके पास थी आत्म -बल की शक्ति। 
अतः रोना बंद करो जीवन को उन्नत बनाने के लिए समर्पित कर्म करो ,जिसमे कर्तापन का अहंकार न हो। ऐसा कर्म करे जिसमे सेवा व् धर्म हो। कुछ हमारी मानसिकता कुछ हमारे आस पास का वातावरण हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। जैसे परिवेश हम रहते हैं ,स्वयं को वैसा ही समझने लगते हैं। राजा का बेटा स्वयं को…
आदतों के गुलाम मत  बनो
  मनुष्य आदतों का गुलाम बनारहता है।  आदतें क्या हैं ,जिन्हें हम कई बार छोड़ना तो चाहतें हैं ,परन्तु छोड़ नहीं पाते। किसी भी आदत के आभाव में जब मनुष्य स्वयं को असहज महसूस करता है,तब वह आदत उसकी कमजोरी बन जाती है। आदतें क्या हैं ,आदतें दो प्रकार की  होती हैं ,एक अच्छी आदतें ,दूसरा बुरी आदतें। परन्तु आदतें अच्छी हों या बुरी  उनका गुलाम बन जाना उचित नहीं।

वास्तव में होता क्या है ,कि कोई मनुष्य किसी आदत को छोड़ना भी चहता है पर छोड़ नहीं पाता ,सोचता है की लोग क्या कहेगे ,मनुष्य स्वयं के बारे से ज्यादा  समाज के बारे में सोचता है. मनुष्य को समाज की चिंता अधिक होती है। मनुष्य अगर स्वयम में बदलाव भी लाता है तो समाज को ध्यान में रखकर लता है।
आज के आधुनिक समाज में अपना प्रभाव दिखाने के लिए कई बुरी आदतों को अपना लिया जाता है ,अंजाम चाहे जो भी हो,उदाहरण  के लिए ,अरे यार कुछ तो अपना लाइफ स्टाइल बदलों अगर मेरे पास इतना पैसा होता ,तो मेरा लाइफ -स्टाइल देखते बिलकुल बदल जाता। मेरे तो पैर ही जमीन पर नहीं पड़ते। दो -चार नौकर गाड़ीयाँ तो जरुर रखता समाज में आज तुम्हारी पहचान है। बदलाव तो ला…

"मात्र भूमि की शान में "

महात्मा गाँधी प्यारे बापू , अंहिंसा के  पुजारी को शत-शत नमन। भारत की आन में ,मात्रभूमि  की शान मे, नतमस्तक ,नतमस्तक ,नतमस्तक। भारतवासियों के हृदय में माँ तुल्य पूजनीय है भारत , वात्सल्य के समुद्र का सैलाब है भारत।
भारत सद्विचारों से हरा- भरावृक्ष है, सरलता- सादगी है श्रृंगार इसके ,  सरलता पवित्रता का सूचक है , सरल है ,  कमजोर नहीं ,  शस्त्र नहीं शास्त्रों को देता है प्राथमिकता। 



कपट से दूर ऊच्च संस्कारों के आदर्श हैं  इसका मूल , मात्रभूमि के सपूतों में है वो आग दुश्मन को मुह तोड़ देने को जवाब।


सिंह की दहाड़ ,कंकड़ नहीं पहाड़ है ,चिंगारी नहीं वो आग है।  तीर नहीं तलवार है ,शाखा नहीं वृक्ष है ,बूंद नहीं समुद्र है। तूफान है,सैलाब है ,शस्त्रों का है पूरा ज्ञान ,दुश्मनों के छक्के छुड़ाने को रहते हैं सीना तान ,  चिंगारी नहीं आग है।  अद्भुत है मेरा भारत ,अतुलनीय पर्वत सा विशाल हृदय है ,सूर्य सा तेज , पर नहीं किसी से द्वेष ,  विश्व में भारत की है अपनी अलग पहचान , भाई -चारे संग ,धरती पर स्वर्ग बनाने का संदेश ,   अदभुत , अतुलनीय है मेरा देश।


मेरा भारत है  महान , हमी से है इसकी शान ,     समस्त भारत वासी बने इसकी आन …
हँसना  संतुष्टता की निशानी है। 
 खुश रहने का सबसे बड़ा मंत्र है संतुष्टि . प्रसन्नता ख़ुशी केवल भाव ही नहीं अपितु जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। ख़ुशी या प्रसन्नता को बेचा या खरीदा नहीं जा सकता। .ख़ुशी या प्रसन्नता को बेचा या खरीदा नहीं जा सकता। ख़ुशी प्रसन्नता सृष्टिकर्ता द्वारा दिए गए अनमोल रत्न हैं। ख़ुशी को जितना लुटाया जाए उतनी बढती है। ख़ुशी या प्रसन्नता वातावरण को सुंदर बनाते हैं। शुभ शक्तियों का सांचर होता है। 
  कुछ लोग मानते हैं की ख़ुशी सिर्फ धन -दौलत वालों के पास होती है। परन्तु यह सत्य नहीं है। धन -दौलत वाले अधिक चिंता ग्रस्त रहते हैं ,उन्हें इस बात  की चिंता रहती है। की उनकी दौलतकहीं चोरी न हो जाये नुकसान न हो जाये। हाँ धन -दौलत वालों के पास सुविधाएँ अधिक अवश्य होती हैं परन्तु अधिक सुविधाएँ ही असुविधा का भय का कारण होतीं हैं। जबकि कम दौलत वाला अधिक खुश रह सकता है.। ख़ुशी बाहरी हो ही नहीं सकती, क्योंकि बाहरी वस्तुएं हमेशा रहने वाली नहीं होती जो ख़ुशी आन्तरिक होती है, वेह टिकती है इसलिए कहते हैं खुश रहो सवस्थ रहो ,क्योंकि स्वस्थ मन से सवस्थ जीवन जिया जा सकता है।  अगर हम बच्चों की तर…

"बिचौलियों से अनुरोध इसे व्यापार ना बनाए"

भगवान के बाद यदि धरती पर किसी को दूसरा स्थान मिला है , तो  है  '' चिकित्सक  यानि डॉक्टर ''  इस पद की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए योग्यता को प्राथमिकता   दी जाए ।  ना की नोटों के बण्डल को ।  
 इसकी गुणवत्ता से खिलवाड़ ,स्वयं व् समाज के                                 साथ खिलवाड़ । 





झुकता वही है जिसमे बल होता है ।

पहले तो इस  भ्रम  को बदल  दीजिये  ,की झुकने वाला  कमजोर  होता है   हाँ झुकने का मतलब  यह बिल्कुल नहीं , की  आप अपने को निर्थक ,नक्कारा समझे  .  अतामविश्वाश से भरा व्यक्ति  कभी कमजोर हो ही नहीं  सकता  । 
झुकता कौन है ? 

सदभावनाओ  और सद्विचारों  से भरे हृदय में ही झुकने  की सामर्थ्य  होती  है । 
क्योंकि फलो  से लदा हरा  -भरा  वृक्ष ही  झुकता है और    सूखा  हुआ  वृक्ष हमेशा  सीधा तना और अकड़ा रहता  है ।  
 तकरार  न समझी  की निशानी है ।                                                

बार -बार समझाने  पर जो नहीं समझाता उसे  उसके हाल  पर छोड़ देना  चहिए । 
सीधे  सरल लोगो को दूनियाँ मुर्ख समझती है परन्तु सरलता का
 महत्व वही जानता है जो सरल है  सरलता से मानसिक शांति मिलती है 
 लड़ने वाला  सवयं को बहादुर  समझता है सोचता है की लड़ाई न करने  वाला  डरपोक है वह  यह नहीं जानता की लड़ाई न करने वाला लड़ाई से होने  वाले विनाश व् प्रकोप  से बचाता है । 
क्रोध से बड़ा  कोई शत्रु नहीं  ,क्रोध मुर्खता  से प्रारम्भ  होता है । 
 आवश्यकता  है आज के युग  में कमल  की तरह कीचड़ में रहते हुए स्वयं 

को कीचड़ से बचाने की । 
अस…

"सफलता की सीढ़िया "

~ सफलता  पर  सभी  का  अधिकार  है   .  कठिन  परिश्रम सच्ची  लगन  पूर्ण निष्ठा  से  कर्म  करने  के  बावजूद  कभी- कभी  हताशा  और  निराशा  मिलती  है .

~   छोटी -छोटी  बातों  पर अमल  करके  सफलता  की  सीड़ियाँ  चढ़ा  जा  सकता  है                                                                                                                                                                                                           ~ सीधा   सरल  सच्चा  रास्ता  थोड़ा लम्बा  और  कठनाइयों  भरा  हो  सकता  है      परंतु   इसके  बाद  जो  सफलता  मिलती  है    वह चिरस्थाई   और  कल्याणकारी   होती  है

"  कहते      हैं    ना  ,     देर     आए    पर    दुरुस्त                                        आए  "
~ कई  बार  व्यक्ति  रातों -रातों  रात  सफल  होना  चाहता  है  वह कई  गलत   तरीके  अपनाता  है   और  सफल  भी  हो  जाता  है  परन्तु  वह  सफलता  टिकती नहीं  क्योंकि  खोखले  कमजोर  साधन  मजबूती  कैसे  दे  सकते  है  फिर  शर्मिंदगी  का  सामना करना  पड़ता है।���������������������������������������������������…

ऊँचाइयां शीर्ष कि

विधियां जहाँ मिलती है निधियाँ

ऊँचाइयां  बाल कहानी संग्रह जिसमे सत्रह कहानियाँ हैं । प्रतेयक कहानी को इस तरह लिखा गया है की मनोरंजन के साथ -साथ पाठक का मार्गदर्शन हो और उससे  प्रेणना भी मिले ।

~  पहली कहानी "मोबाइल टेलीविज़न कंप्यूटर"  में बताया गया है ,की" आधुनिक होना उचित है  परन्तु आधुनिकता की दोड़ में भले बुरे के विवेक के साथ अपनी संस्कृति व् उच्च संस्कारो की रक्षा भी होनी चाहिए ''

~दूसरी कहानी'' टिमटिम के सपने ''में मनोरंजन के साथ यह लिखा गया है की सपने देखने पर सबका अधिकार है अपने उज्जवल भविष्य के सपने देखने और उसे पूरा करने का हमारा दायित्व है। 

~ तीसरी कहानी'' पैगाम ''से यह पैगाम मिलता है की  उच्च संस्कृति एवं संस्कारो  वाले इस देश में धन के बल पर इंसानियत का अपमान होना अत्यंत शर्मनाक है। 

~  चौथीकहानी''हमारा अधिकार ''

~  पाचवी कहानी" बेटियां ''कहानी दिल को छूने वाली है। उद्देश्य यह है की अंतर बेटे या बेटियों  में नहीं दोष मानवीय सोच का हैआव्य्शाकता  मानवीय सोच बदलने की है जननी का अपमान सवयं का अपमान…