संदेश

"*वसुन्धरा**

वसुन्धरा**
जिस धरती पर मैंने जन्म लिया ,
उस धरा पर मेरा छोटा सा घर
मेरे सपनों से बड़ा ।।
बड़े -बड़े अविष्कारों की साक्षी वसुन्धरा
ओद्योगिक व्यवसायों से पनपती वसुन्धरा ।

पुकार रही है वसुन्धरा
,कराह रही है वसुन्धरा ।

देखो तुमने ये मेरा क्या हाल किया
मेरा प्राकृतिक सौन्दर्य ही बिगाड़ दिया ।

हवाओं में तुमने ज़हर भरा
में थर-थर कॉप रही हूँ वसुन्धरा
अपने ही विनाश को तुमने मेरे

दामन में फौलाद भरा
तू भूल गया है ,ऐ मानव

मैंने तुझे रहने को दी थी धरा ।
तू कर रहा है मेरे साथ जुल्म बड़ा

मेरे सीने में दौड़ा -दौड़ा कर पहिया
मेरा आँचल छलनी किया ।

मै हूँ तुम्हारी वसुन्धरा
मेरा जीवन फिर से कर दो हरा -भरा

उन्नत्ति के नाम पर धरा पर है प्रदूषण भरा
जरा सम्भल कर ऐ मानव प्राकृतिक साधनों का तू कर उपयोग जरा

**औकात की बात मत करना **

** एक गाँव मे एक सेठ रहता था ,उसका अपने गाँव में बड़ा ही नाम था कहते हैं ,वह सेठ बहुत बड़ा दानी भी था ।

कोई भी शुभ दिन हो ,कोई त्यौहार हो ,वह सेठ गरीबों को भोजन कराता, भोजन कराने के बाद वह सेठ सबको दक्षिणा भी देता , और कोई जो  कुछ माँगता उसे यथासम्भव देता। सब लोग सेठ के सामने नतमस्तक होते और जय-जय हो सेठ जी की जय हो जय हो कहते ।

 परन्तु उनमें से एक बूढ़ा फ़कीर हाथ जोड़ कर कहता खुश रहो,सेठ जी भगवान आपको और दे ।
सेठ जी काफी समय ... उस बूढ़े फ़कीर की इस हरक़त से सोच में रहते कि बाकी सब लोग तो मेरे सामने नतमस्तक होते हैं, और जय-जयकार बोलते हैं ,और ये फ़क़ीर उल्टा मुझे ही आशीर्वाद देता है ,जैसे ये ही मुझे सब दे रहा हो।

एक दिन सेठ ने उस बूढ़े फ़कीर से पूछ ही लिया,एक बात बता

 प्रश्न :- फ़क़ीर ? तुम्हें भोजन किसने कराया ?

उत्तर:- बुढे फ़क़ीर ने कहा-- जी सेठ जी आपने ।

प्रश्न- सेठ जी ने पूछा तुम्हें पैसे किसने दिये ?

उत्तर:-बूढ़े फ़क़ीर ने कहा --सेठ जी आपने

प्रश्न :-  सेठ जी बोले तो फिर तू मेरे सामने सिर क्यों नही
झुकाता ,ना ही मेरी जय-जयकार बोलता है ,तू फ़क़ीर होकर मुझे आर्शीवाद देता है, औकात क्या है तेरी ?

बूडा …

* धरती पर स्वर्ग जैसा है *ऋषिकेश*

*ऋषिकेश* यह वास्तव में देवों की धरती है
       गौ मुख से प्रवाहित ,गंगोत्री जिसका धाम ,
       अमृतमयी ,निर्मल गँगा माता को मेरा शत-शत
             प्रणाम *

 *  देवों की भूमि है,अमृतमयी गँगा की अमृत धारा है *        " ये जो शहर हमारा है "   * इसका बड़ा ही रमणीय नज़ारा है ,  *  हिमालय की पहाड़ियों का रक्षा कवच है ,*   *  नीलकण्ठ महादेव का वास है     * बदरीनाथ, केदारनाथ,का आशीर्वाद है,*       लक्ष्मण झूला का भी प्रमाण है।    * मन्दिरों में गूँजते शंखनाद हैं ।
    महात्माओं के मुख से सुनते सत्संग का प्रसाद है ।
    निर्मल,शान्त,अध्यात्म से परिपूर्ण सत्संगी वायुमंडल सारा है    वास्तव में प्रकर्ति,और परमात्मा ने इसे खूब सवांरा  है     अद्भुत अतुलनीय ,स्वर्गमयी ये *ऋषिकेश*शहर हमारा है।।

**सुप्रभात**

सुप्रभात **
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💐वन्दन परमात्मा ,💐
एक और नयी सुबह
नयी-नयी अभिलाषाएं
नव निर्माण को एक और क़दम
नयी पीढ़ी की नयी सोच संग ,
नव सपनों को सच करने की
नयी तरंग ,नया ढँग है ,नयी उमंग
नये इरादे, नयी सीढ़ियाँ ,
नयी दुनियाँ की ,नयी इबारत लिखने को
नयी पीढ़ी के नये क़दम
इस नयी पीढ़ी को ,
नव नूतन समाज की,
बुनियाद रखने को दो
परमात्मा तुम अपने आशीर्वाद
का संग, जीवन की सरगम
फले-फूले नव -नूतन समाज
चाहे नया रूप हो,नया-नया ढँग
सज्जनता संग , प्रग्रति के पथ पर
अग्रसर उन्नति की ऊंचाइयाँ ,छुये
मेरे देश का जन-जन ,
समृद्धि से परिपूर्ण हो मेरे देश
का कण-कण ।

**स्वास्थ्य धन**

* स्वास्थ्य यानी तन-और मन दोनों की सुदृणता *
जहाँ *शारीरिक स्वास्थ्य के लिये पौष्टिक आहार ,व्यायाम ,योगा लाभदायक है।
वैसे ही मन की स्वस्तथा के लिये मैडिटेशन,योगा ,साथ ही साथ विचारों की सकारात्मकता क्योंकि* ज़िंदगी की दौड़ में अगर जीत है तो हार भी है* मुश्किलें भी हैं ,बस हमें अपनी हार और नाकामयाबी से निराश नही होना है ,ये नही तो दूसरा रास्ता अपनाये अपने मन की सुनिए ।

    *हमारे विचार बहते हुए पानी की तरह हैं, और पानी का काम है बहते रहना रुके हुए पानी मे से दुर्गन्ध आने लगती है ।*
 *  जहाँ तन का स्वस्थ होना आवयशक है वहीं मन मस्तिष्क का स्वस्थ होना भी अनिवार्य है *
आज की भागती दौड़ती जिन्दगी में हम मन के स्वास्थ्य पर बिल्कुल भी ध्यान ही नही देते मतलब कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते- चढ़ते हम मनुष्य अपने दिमाग़ पर एक बोझ बना लेते हैं, बोझा कामयबी और काम के दवाब का ;

कामयाबी तो मिलती है धन भी बहुत कमाते हैं ,परन्तु अपना सबसे बड़ा धन अपना स्वास्थ्य बिगाड़ देते हैं, किस काम की ऐसी कामयाबी और दौलत जिसका हम सही ढंग से उपयोग भी न कर सकें।
दुनियाँ का सबसे बड़ा धन क्या है ।आम जन तो यही कहेंगे रुपया, पैसा, धन-…

💐पत्थर💐

💐 * पत्थर*💐
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
आज जो तस्वीर लोगों के आकर्षण
का केंद्र है, जिसे निहार लोग कारीगिरी
की तारीफ कर रहे हैं ,वह कहीं किसी राह
पर पड़ा पत्थर ही था ।
किसी की खुबसूरत सोच ने और मेहनत ने उस
पत्थर को भगवान बना दिया ।

* जिस तस्वीर को तराशने में जितना
* अधिक समय लगता है ,वह तस्वीर उतनी ही सुन्दर बनती है ।
पत्थर को भी मजबूत होना पड़ता है तरशने के लिये
* ना जाने कितने युग बीत जाते हैं ,तरशने की हद से गुजरने के लिए
*कर्मों के बीज बोते रहो ,
*समय आने पर ही फ़सल होगी।

बीज डालने के बाद फल आने में समय
लगता है ,समय से पहले फल की चाह करना
मतलब कच्चे फल खाने जैसा हुआ।

सफलता की चाह रखने वालों की
राहें बेशक़ आज फूलों से सजी होंगी
परन्तु उन्होंने भी एक लंबा सफ़र पत्थर सी
मुश्किल राहों पर होके गुजारा होगा ।

*अवसाद या डिप्रेशन *पर विशेष *

अवसाद या डिप्रेशन *पर विशेष *

  *क्या हुआ जो हम किसी के जैसे नहीं
  हम जैसे है , वैसे ही अच्छे हैं
 हमारी अपनी पहचान है ,क्यों हम
   किसी की पहचान जैसे बने

   " डिपरेशन" या "अवसाद"
  आखिर ये डिप्रेशन है क्या ?
क्या डिप्रेशन कोई बीमारी है ?
आज के युवाओं में डिप्रेशन एक महामारी के रूप में फ़ैल रहा है।
  डिप्रेशन  दीमक की तरह किसी भी इंसान  को अन्दर ही अन्दर खोखला कर देता है ।
डिप्रेशन है ,हमारी सोच ,किसी भी बात को सोचने के दो पहलू होते हैं ।
एक सकारात्मकता , और एक नकारात्मकता
 डिप्रेशन नकारात्मक सोच का बड़ा ही जहरीला रूप है ।,डिप्रेशन की अवस्था में इन्सान की सोच इतनी नकारात्मक हो जाती है ,कि वह इंसान अच्छी चीज में उलटा सोचने लगता है ,डिप्रेशन वाले व्यक्ति को लगता है जैसे उसके खिलाफ कोई साजिशें रच रहा है ,क्योंकि उसकी आँखों पर नकारात्मकता का चश्मा जो चढ़ा होता है।
कभी -कभी हमारा डिप्रेशन ,यानि हमारी नकारात्मक सोच इतना भयंकर रूप ले लेती है,कि डिप्रेशन वाला व्यक्ति स्वयं ही स्वयं का दुश्मन बन आत्महत्या तक कर लेता है ।

अवसाद की स्थिति आने ही न पायें ,इसकेलिए इस पीढ़ी को और …